झारखंड
एक दिन पहले
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भगवान शिव के भक्तों की देशभर में गहरी आस्था है और उनकी महिमा से जुड़ी कथाएं अनगिनत हैं। श्रद्धालु उन्हें मूर्ति और लिंग दोनों स्वरूपों में पूजते हैं। देश में अनेक ऐसे शिवलिंग हैं जिनसे विशेष मान्यताएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं। ऐसा ही एक रोचक शिवलिंग झारखंड में स्थित है, जिसके दर्शन को बेहद दुर्लभ माना जाता है।
बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथधाम
देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथधाम देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। इसे मनोकामना लिंग माना जाता है, यानी सच्चे मन से मांगी गई हर इच्छा यहां पूरी होने की मान्यता है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग राज्यों से लोग बाबाधाम आकर जलार्पण करते हैं। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि यह यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक श्रद्धालु दुमका जिले के बासुकीनाथधाम पहुंचकर भगवान शिव का दर्शन नहीं कर लेते।
बैद्यनाथ का दरबार पूरा करने वाला बासुकीनाथधाम
बाबाधाम से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित बासुकीनाथधाम को बाबा बैद्यनाथ का दरबार पूरा करने वाला धाम माना जाता है। यहां के पुरोहितों के अनुसार, जो भक्त बाबाधाम में पूजा के बाद बासुकीनाथ में भी जलार्पण करते हैं, उनकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। यही वजह है कि सावन हो या सामान्य दिन, बड़ी संख्या में श्रद्धालु दोनों धामों के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस मंदिर की अपनी अलग धार्मिक महत्ता है और यहां की कई परंपराएं लोगों की आस्था से गहराई से जुड़ी हैं।
शिवगंगा की गहराई में स्थापित पाताल बाबा
बासुकीनाथधाम परिसर में एक पवित्र शिवगंगा तालाब भी स्थित है। मंदिर में पूजा से पहले श्रद्धालु इस तालाब में स्नान कर स्वयं को पवित्र मानते हैं। इसी शिवगंगा की गहराई में एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जिसे श्रद्धालु आदरपूर्वक पाताल बाबा के नाम से जानते हैं। आम दिनों में यह शिवलिंग पूरी तरह पानी के भीतर डूबा रहता है, इसलिए सालभर इसके दर्शन संभव नहीं हो पाते। यही कारण है कि पाताल बाबा के दर्शन को अत्यंत दुर्लभ माना जाता है।
ज्येष्ठ माह की विशेष परंपरा
हर वर्ष सावन शुरू होने से पहले ज्येष्ठ माह में एक खास परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान बासुकीनाथधाम के पुरोहित, स्थानीय ग्रामीण और प्रशासन के सहयोग से शिवगंगा तालाब का पानी निकाला जाता है और उसकी साफ-सफाई की जाती है। जब तालाब का जलस्तर घटता है, तब वर्षों से जलमग्न पाताल बाबा के दर्शन श्रद्धालुओं को होते हैं। इस अवसर का लोग पूरे साल इंतजार करते हैं और दूर-दूर से शिवभक्त केवल इस दुर्लभ दृश्य को देखने बासुकीनाथ पहुंचते हैं।
दर्शन पर उमड़ा श्रद्धालुओं का उत्साह
हाल ही में लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर पाताल बाबा के दर्शन होने पर श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह देखा गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर के पुजारियों ने षोडशोपचार विधि से भगवान शिव का विशेष पूजन कराया और भव्य श्रृंगार किया। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच श्रद्धालु शिवगंगा कुंड में उतरकर जलार्पण करते नजर आए। कई भक्तों ने कहा कि पता नहीं अगली बार ऐसा अवसर कब मिलेगा, इसलिए इस बार दर्शन और पूजा का महत्व और भी बढ़ गया है। कुंड के आसपास भक्ति, श्रद्धा और हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
करीब 300 साल पुराने स्वयंभू शिवलिंग का चमत्कार
पाताल बाबा को लेकर स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच एक रोचक मान्यता भी प्रचलित है। स्थानीय तीर्थपुरोहित लम्बोदर मिश्रा बताते हैं कि यह स्वयंभू शिवलिंग लगभग 300 वर्ष पहले प्रकट हुआ था। हैरानी की बात यह है कि वर्षों तक पानी में डूबे रहने के बावजूद बाबा पर चढ़ाए गए बिल्वपत्र, फूल, अबीर और अन्य पूजन सामग्री पूरी तरह सुरक्षित दिखाई देती है। जब शिवगंगा का पानी निकाला जाता है और पाताल बाबा के दर्शन होते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो अभी-अभी उनका श्रृंगार किया गया हो। श्रद्धालु इसे भगवान शिव की दिव्य कृपा और चमत्कार मानते हैं। यही वजह है कि बासुकीनाथ का पाताल बाबा आज करोड़ों शिवभक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है।
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