स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026: जहरीली हवा के बावजूद दिल्ली ने भरी लंबी उड़ान, श्रीनगर और बेंगलुरु को छोड़ा पीछे राष्ट्रीय राजनीति 2 घंटे पहले 5
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में दिल्ली ने अपनी रैंकिंग में बड़ा सुधार करते हुए 21वां स्थान हासिल किया है, जबकि पिछले साल राजधानी 32वें नंबर पर थी। हालांकि यह उपलब्धि प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों पर आधारित है, लेकिन हवा की वास्तविक गुणवत्ता अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।

दिल्ली की रैंकिंग में चौंकाने वाला उछाल

सर्दियों के महीनों में जहरीले कोहरे और खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने वाले प्रदूषण के लिए जानी जाने वाली दिल्ली ने 'स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026' में सबको हैरान कर दिया है। 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में राष्ट्रीय राजधानी ने 21वां स्थान हासिल किया है। इस उपलब्धि के साथ ही दिल्ली ने बेंगलुरु, श्रीनगर, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों को काफी पीछे छोड़ दिया है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सोमवार को जारी की गई यह सूची दिल्ली के प्रदूषण के खिलाफ उठाए गए कदमों की एक नई तस्वीर पेश करती है। इस साल दिल्ली को सर्वेक्षण में 172 अंक मिले हैं, जिसके चलते वह विशाखापत्तनम के साथ संयुक्त रूप से 21वें पायदान पर काबिज हुई है।

सर्दियों में AQI का खौफ

यह रैंकिंग कई लोगों के लिए भ्रम पैदा करने वाली हो सकती है, क्योंकि दिल्ली की पहचान अक्सर देश के सबसे प्रदूषित महानगरों में की जाती है। सर्दियों के मौसम में अक्सर यहां का वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI 400 के आंकड़े को पार कर जाता है, जो 'गंभीर' श्रेणी में आता है। कई बार तो यह स्तर 450 के निशान को भी पार कर जाता है। ऐसे में सामान्य नागरिक के लिए यह समझना मुश्किल है कि जो शहर सांस लेने लायक हवा के लिए संघर्ष कर रहा है, वह स्वच्छ वायु रैंकिंग में बेहतर कैसे हो सकता है।

रैंकिंग का पैमाना सिर्फ हवा की शुद्धता नहीं

इस पहेली का जवाब सर्वेक्षण के मानदंडों में छिपा है। दरअसल, यह सर्वेक्षण केवल यह नहीं देखता कि हवा में प्रदूषण की मात्रा कितनी है, बल्कि यह इस बात पर अधिक जोर देता है कि संबंधित शहर की सरकार ने प्रदूषण को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर क्या प्रयास किए हैं। इसमें सड़क की धूल को नियंत्रित करने, वाहनों से निकलने वाले धुएं पर लगाम लगाने, ठोस कचरा प्रबंधन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल का प्रबंधन, औद्योगिक उत्सर्जन को कम करने और आम जनता के बीच जागरूकता फैलाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं।

यही कारण है कि दिल्ली को इन प्रशासनिक प्रयासों के लिए अच्छे अंक मिले हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि दिल्ली ने प्रदूषण नियंत्रण की अपनी कार्ययोजनाओं को बेहतर तरीके से लागू किया है, भले ही हवा की गुणवत्ता अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। इसलिए, दिल्ली की इस 21वीं रैंक को यह नहीं माना जाना चाहिए कि अब हवा श्रीनगर या बेंगलुरु से अधिक शुद्ध हो गई है।

लखनऊ का दबदबा और अन्य शहरों की स्थिति

10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की इस दौड़ में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ने बाजी मारी है। लखनऊ ने 198 अंक प्राप्त करके पहला स्थान हासिल किया है। दूसरे स्थान पर इंदौर रहा, जिसे 197 अंक मिले। हालांकि इंदौर लगातार आठ वर्षों से स्वच्छता सर्वेक्षण में शीर्ष पर रहा है, लेकिन स्वच्छ वायु सर्वेक्षण के मानक पूरी तरह अलग होते हैं। मध्य प्रदेश का जबलपुर 195 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर है, जबकि भोपाल और आगरा 192 अंकों के साथ संयुक्त रूप से चौथे स्थान पर काबिज हुए हैं।

दिल्ली के प्रदर्शन की तुलना अन्य बड़े शहरों से करें तो परिणाम दिलचस्प हैं। पटना को 178 अंकों के साथ 16वां स्थान और हैदराबाद को 19वां स्थान मिला है। दिल्ली के बाद मुंबई 160.8 अंकों के साथ 28वें स्थान पर रही। बेंगलुरु 32वें, चेन्नई 35वें और कोलकाता 38वें स्थान पर खिसक गए हैं। यह दिखाता है कि बड़े महानगरों में से दिल्ली ने प्रदूषण प्रबंधन की नीति को बेहतर तरीके से क्रियान्वित किया है।

एक साल में 11 पायदान की छलांग

दिल्ली की इस प्रगति को पिछले साल के आंकड़ों के साथ देखने पर पता चलता है कि सुधार वाकई प्रभावी है। साल 2025 के सर्वेक्षण में दिल्ली 157.3 अंकों के साथ 32वें स्थान पर थी। इस बार स्कोर बढ़कर 172 हो गया है और वह 11 स्थानों की लंबी छलांग लगाकर 21वें स्थान पर पहुंच गई है। यह सुधार दर्शाता है कि राजधानी में प्रशासन और नगर निकायों ने मिलकर प्रदूषण कम करने की रणनीतियों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है।

PM2.5 और PM10 के आंकड़े अब भी चिंताजनक

प्रशासनिक सुधारों के बावजूद दिल्ली की फिजा में घुले जहर का सच अभी भी बरकरार है। आंकड़ों के अनुसार, 2025 का साल दिल्ली के लिए 2018 के बाद से सबसे अच्छा था, यदि कोविड महामारी के वर्ष 2020 को छोड़ दिया जाए। फिर भी, वार्षिक औसत PM10 का स्तर 198 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और PM2.5 का स्तर 97 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया था। भारत के निर्धारित मानकों के अनुसार PM10 की वार्षिक सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और PM2.5 की सीमा 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसका मतलब है कि वास्तविक प्रदूषण का स्तर तय मानकों से अभी भी दो गुना से अधिक है।

सर्दियों की चुनौतियां और GRAP

बीते सर्दियों के मौसम यानी 2025-26 के दौरान दिल्ली की हवा ने एक बार फिर से अपना दम दिखाया था। जनवरी 2026 में हालात इतने खराब हो गए थे कि प्रशासन को GRAP के चौथे चरण यानी स्टेज-IV के प्रतिबंधों को लागू करना पड़ा था। दिल्ली की प्रदूषण की समस्या इतनी जटिल है कि उसे केवल एक सर्वेक्षण की रैंकिंग से नहीं समझा जा सकता। यहां का मौसम, पराली जलाने की घटनाएं, सड़कों की धूल, औद्योगिक इकाइयां और निर्माण कार्य ऐसे कारक हैं जो एक साथ मिलकर हवा को जहरीला बना देते हैं।

क्या यह असली जीत है?

निस्संदेह, 21वीं रैंक दिल्ली द्वारा प्रदूषण से लड़ने की दिशा में किए गए प्रयासों की स्वीकारोक्ति है। लेकिन इसे मंजिल नहीं माना जा सकता। जब तक राजधानी की हवा राष्ट्रीय मानकों के करीब नहीं पहुंचती, तब तक दिल्लीवासियों के लिए सांस लेना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। यह रैंकिंग राहत तो देती है, मगर यह याद दिलाती है कि अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है ताकि दिल्ली की हवा भी अन्य शहरों की तरह शुद्ध हो सके।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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