घर से काम करने के दो हफ्ते बाद ही क्यों 'फ्राइड' हुआ महिला का दिमाग, सामने आया हैरान करने वाला अनुभव
राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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वर्क फ्रॉम होम का बदलता नज़रिया
कोरोना महामारी के दौर के बाद से ही वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की संस्कृति पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी काफी प्रचलित हो गई है। अक्सर लोग घर से काम करने को एक सुविधाजनक और आरामदायक विकल्प मानते हैं, जिसमें ट्रैफिक से मुक्ति और घर के माहौल में काम करने का सुकून मिलता है। लेकिन क्या यह वास्तव में उतना ही सरल है जितना हमें बाहर से दिखाई देता है? हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर मोहिनी चव्हाण द्वारा साझा किया गया एक अनुभव इस चर्चा को फिर से ताजा कर दिया है कि क्या हमेशा घर से काम करना वाकई उतना ही सुखद है।
दो हफ्ते के अनुभव ने खोली आँखें
मोहिनी चव्हाण जिस कंपनी में कार्यरत हैं, वहां आमतौर पर हाइब्रिड वर्किंग मॉडल का पालन किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि कर्मचारियों को सप्ताह के कुछ दिन ऑफिस से और कुछ दिन घर से काम करने की छूट मिलती है। इसके अलावा, कंपनी की पॉलिसी के तहत साल में दो हफ्ते ऐसे भी आते हैं जब कर्मचारी पूरी तरह से घर से काम कर सकते हैं। मोहिनी ने भी इस सुविधा का लाभ उठाया और अपने घर से काम करने का निर्णय लिया। हालांकि, इन दो हफ्तों के बाद उनके विचार पूरी तरह बदल गए और उन्हें अपने पुराने हाइब्रिड रूटीन की अहमियत समझ में आई।
काम का बोझ और घर का माहौल
मोहिनी ने अपने अनुभव के जरिए उन सभी कर्मचारियों को सलाम किया है जो लंबे समय से स्थायी तौर पर घर से काम कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल दो हफ्ते घर से काम करने के बाद ही उनका मानसिक स्वास्थ्य काफी प्रभावित महसूस होने लगा। उन्होंने बताया कि अक्सर लोग इन दो हफ्तों की छुट्टी को अपने होमटाउन यानी गृह नगर जाने के अवसर के रूप में देखते हैं। हालांकि घर पहुंचने की खुशी तो होती है, लेकिन काम के दबाव में कोई कमी नहीं आती। चाहे दफ्तर हो या घर, काम की मात्रा लगभग समान रहती है, जिससे संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
एक जैसी दिनचर्या से बढ़ी थकान
मोहिनी के अनुसार, उनके लिए सबसे बड़ी समस्या एकरसता और बोरियत थी। इन दो हफ्तों के दौरान उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा जैसे वे अपने घर की चारदीवारी से बाहर ही नहीं निकली हैं। सुबह बिस्तर से उठने, काम करने, भोजन करने और फिर अगले दिन उसी थकाऊ दिनचर्या को दोहराने का सिलसिला चलता रहा। उनका कहना है कि वीकेंड भी इस रूटीन को पूरी तरह से नहीं बदल पाया, क्योंकि दो दिनों के अवकाश में से उन्होंने केवल एक दिन ही बाहर जाकर बिताया। जब हर दिन एक ही स्थान और एक ही माहौल में गुजरता है, तो मानसिक स्तर पर भारी थकान महसूस होने लगती है, जो उत्पादकता को भी प्रभावित करती है।
ऑफिस जाने के फायदे
अपने अनुभव के आधार पर मोहिनी ने कहा कि उन्हें हाइब्रिड वर्किंग मॉडल कहीं ज्यादा बेहतर लगता है। ऑफिस जाने से केवल कार्यक्षेत्र ही नहीं बदलता, बल्कि सहकर्मियों से मिलना-जुलना, आपसी चर्चा करना और नई चीजें सीखने का बेहतरीन अवसर मिलता है। हाइब्रिड सिस्टम में, सप्ताह में दो दिन दफ्तर जाकर साथियों के साथ खाना खाना और विचार साझा करना उन्हें ऊर्जावान बनाए रखता है। इसके साथ ही, घर से ऑफिस के बीच का सफर रोजमर्रा की जिंदगी में एक जरूरी बदलाव लाता है, जिससे मानसिक ताजगी बनी रहती है।
क्या हर किसी के लिए बेहतर है वर्क फ्रॉम होम
मोहिनी का यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है और यह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि क्या लंबे समय तक घर से काम करना हर व्यक्ति के लिए सही विकल्प है? हालांकि कुछ लोगों के लिए यह आजादी का माध्यम हो सकता है, लेकिन दूसरों के लिए एक ही माहौल में सीमित रहना तनाव का कारण बन सकता है। फिलहाल, मोहिनी अपने हाइब्रिड रूटीन में वापस लौटने के लिए काफी उत्सुक हैं। उन्होंने अंत में उन कर्मचारियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया जो लगातार घर से काम कर रहे हैं और यह स्वीकार किया कि उनके लिए इस तरह के चुनौतीपूर्ण रूटीन को लंबे समय तक मैनेज करना काफी मुश्किल काम है।
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