कांग्रेस का वंदे मातरम् विरोध और सियासी घमासान: कॉफी पर कुरुक्षेत्र में तीखी बहस भारत 2 घंटे पहले 3
वंदे मातरम् के गायन, महिला आरक्षण और जातीय जनगणना जैसे ज्वलंत मुद्दों पर कांग्रेस के रुख को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। इंडिया टीवी के विशेष कार्यक्रम कॉफी पर कुरुक्षेत्र में इन विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

वंदे मातरम् पर कांग्रेस की चुप्पी क्यों

वंदे मातरम् को पूरी तरह से न गाने को लेकर कांग्रेस का स्टैंड एक बार फिर से विवादों के घेरे में है। इस विषय पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर कड़ा प्रहार किया है। अमित शाह का कहना है कि वर्ष 1937 में वंदे मातरम् के संबंध में लिया गया निर्णय देश के बंटवारे की नींव रखने वाली तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान सरकार उस पुरानी गलती को सुधारने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले में कांग्रेस ने खुद ही एक बड़ी गलती यानी सेल्फ गोल कर लिया है, जिससे भारतीय जनता पार्टी को अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को और मजबूती से पेश करने का अवसर मिल गया है।

महिला आरक्षण और परिसीमन की उलझन

महिला आरक्षण विधेयक और लोकसभा सीटों के परिसीमन के मुद्दे ने विपक्ष की घेराबंदी को और मुश्किल बना दिया है। कांग्रेस की मुख्य मांग यह है कि वर्तमान 543 लोकसभा सीटों पर ही महिला आरक्षण को लागू किया जाए और सीटों की संख्या को अगले 25 वर्षों तक के लिए यथावत रखा जाए। हालांकि, दक्षिणी राज्यों का रुख इस मामले में कांग्रेस से अलग है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु के विजय ने दक्षिण भारतीय राज्यों के लोकसभा सीटों के अनुपात में किसी भी प्रकार की कमी न होने का आश्वासन तो मांगा है, लेकिन उन्होंने 543 सीटों को फ्रीज करने की कांग्रेस वाली मांग का समर्थन नहीं किया है। इस स्थिति से कांग्रेस के लिए असहजता पैदा हुई है और डीएमके पर भी दबाव कम होता दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सीटों की संख्या में इजाफा होता है, तो महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ेगी। ऐसे में कांग्रेस का वर्तमान रुख उसे महिला विरोधी के रूप में भी चित्रित कर सकता है।

जातीय जनगणना और यूजीसी के मुद्दे

जातीय जनगणना के विषय पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही हैं। कांग्रेस ने वर्ष 2011 की सामाजिक और आर्थिक जनगणना का उदाहरण देते हुए मौजूदा सरकारी प्रारूप पर प्रश्न खड़े किए हैं। कांग्रेस का तर्क है कि उस समय भी उप-जातियों की गणना में जटिलताएं सामने आई थीं, जो आज भी बरकरार हैं। बहस का मुख्य बिंदु यह है कि जातियों की पहचान का मानक कौन तय करेगा और अलग अलग राज्यों की सूची का राष्ट्रीय स्तर पर एकीकरण कैसे होगा। इसके अतिरिक्त, यूजीसी की गाइडलाइंस पर सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में संकेत दिया है कि वे इस पर पुनः विचार कर रहे हैं। इसे अगड़ी जातियों की आपत्तियों को संबोधित करने का एक संकेत माना जा रहा है, हालांकि बदलाव की ठोस रूपरेखा अभी स्पष्ट नहीं है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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