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एक घंटा पहले
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विचारों
योगी आदित्यनाथ का मिशन मथुरा और हिंदुत्व का असर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा सवाल गूंज रहा है कि क्या राम मंदिर के बाद अब श्री कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनावी जीत की नई सीढ़ी बनेगा। इंडिया टीवी के विशेष कार्यक्रम कॉफी पर कुरुक्षेत्र में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। जानकारों का मानना है कि योगी आदित्यनाथ की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान और उनकी सबसे बड़ी ताकत हिंदुत्व है। वे अपनी इस मूल पहचान से अलग होकर केवल विकास के एजेंडे पर चुनाव नहीं लड़ सकते। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि केवल धार्मिक मुद्दों के दम पर जीत हासिल करना मुश्किल है। पार्टी को मथुरा और अयोध्या जैसे मुद्दों के साथ विकास के कार्यों को भी अपने मुख्य विमर्श में शामिल करना होगा।
अखिलेश यादव की चुप्पी और यदुवंशी होने का दावा
इस चर्चा के दौरान अखिलेश यादव पर भी सवाल उठाए गए हैं। राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज है कि जब भी अखिलेश अयोध्या का जिक्र करते हैं, योगी आदित्यनाथ तुरंत मथुरा और श्री कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा सामने ले आते हैं। अखिलेश यादव खुद को यदुवंशी बताते हैं, इसलिए अब उनसे यह मांग की जा रही है कि वे श्री कृष्ण जन्मभूमि के मामले पर अपना स्टैंड स्पष्ट करें। यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस धार्मिक मुद्दे पर किस तरह की रणनीति अपनाता है।
राम मंदिर ट्रस्ट के नए सीईओ और सुरक्षा का जिम्मा
राम मंदिर ट्रस्ट में नए सीईओ की नियुक्ति ने चर्चा को एक नया मोड़ दिया है। विपक्ष लंबे समय से चढ़ावा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाता रहा है, लेकिन ट्रस्ट ने एक बेहद अनुभवी अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपी है। नए सीईओ का करियर प्रभावशाली रहा है और उन्होंने एयरफोर्स में करीब चार दशक तक अपनी सेवाएं दी हैं। उनके पास सुरक्षा, बुनियादी ढांचे के विकास, वीआईपी आवाजाही और वित्तीय प्रबंधन का व्यापक अनुभव है। चर्चा में बताया गया कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वेस्टर्न कमांड को संभाला था और आदमपुर एयर बेस पर प्रधानमंत्री की अगवानी भी की थी। उनकी नियुक्ति को सुशासन और पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
सरकार का रिपोर्ट कार्ड और कानून व्यवस्था
उत्तर प्रदेश में अब चुनाव के दौरान हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ सरकार के पिछले दस साल के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड भी अहम होगा। योगी सरकार की सबसे मजबूत कड़ी कानून-व्यवस्था को माना जा रहा है। विशेष रूप से महिला मतदाताओं के बीच योगी आदित्यनाथ की छवि काफी सकारात्मक है, जिसे पार्टी अपनी बड़ी उपलब्धि मानती है।
सपा और कांग्रेस के गठबंधन का गणित
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होना लगभग तय है। दोनों दलों की यह मजबूरी है कि वे अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान जारी रह सकती है, लेकिन अंततः वे साथ आएंगे। संभावित रणनीति के अनुसार, कांग्रेस को शहरी सीटों पर प्राथमिकता मिल सकती है, जबकि ग्रामीण इलाकों, मध्य उत्तर प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में समाजवादी पार्टी अपना दबदबा बनाए रखने की कोशिश करेगी।
बीजेपी के सामने चुनौतियां और रणनीति
भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी यानी एंटी-इनकंबेंसी है। इससे निपटने के लिए पार्टी टिकटों में बड़े बदलाव कर सकती है। इसके अलावा, बीजेपी महिला वोटर्स और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को अपनी जीत का आधार मान रही है। विपक्ष जातिगत जनगणना और जातीय समीकरणों को चुनावी केंद्र में लाना चाहेगा, जबकि बीजेपी का पूरा जोर विकास, हिंदुत्व और कानून-व्यवस्था पर रहेगा।
युवाओं की आकांक्षाएं और रोजगार का मुद्दा
चुनावी माहौल में युवाओं के मुद्दे को नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए महंगा पड़ सकता है। चर्चा में यह बात जोर देकर कही गई कि युवाओं की सबसे बड़ी प्राथमिकता शिक्षा और रोजगार है। स्कूलों में सुधार की मांग और सरकार द्वारा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए अधिकारियों को दिए गए कड़े निर्देश भी चर्चा का विषय रहे। कुल मिलाकर यूपी चुनाव में धार्मिक मुद्दों के साथ-साथ विकास, रोजगार और स्थानीय स्तर पर जमीनी हकीकत निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
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