तमिलनाडु में घटती जन्म दर से सरकार चिंतित, क्या तीसरे बच्चे के लिए मिलेगा प्रोत्साहन? राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 5
तमिलनाडु में लगातार गिरती प्रजनन दर और बढ़ती बुजुर्गों की आबादी ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है, जिसे देखते हुए प्रशासन अब अधिक बच्चे पैदा करने वाले दंपतियों को प्रोत्साहन देने की संभावना तलाश रहा है।

तमिलनाडु में घटती जन्म दर की गंभीर चुनौती

भारत में आबादी बढ़ने की रफ्तार को लेकर लंबे समय तक चिंताएं जताई जाती रही हैं, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। देश के कई राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की गति काफी धीमी हो गई है, जिसमें तमिलनाडु का नाम प्रमुखता से उभर कर सामने आया है। राज्य की बिगड़ती डेमोग्राफिक स्थिति अब सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। स्वास्थ्य मंत्री केजी अरुणराज ने हाल ही में इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताते हुए संकेत दिए हैं कि सरकार दंपतियों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करने हेतु नई योजनाओं पर विचार कर सकती है।

टोटल फर्टिलिटी रेट का चिंताजनक स्तर

स्वास्थ्य मंत्री ने ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ साउथ इंडिया की एक कार्यशाला के दौरान बताया कि तमिलनाडु का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) अब 1.4 के स्तर से भी नीचे गिर चुका है। जनसंख्या विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी क्षेत्र की आबादी के स्तर को स्थिर बनाए रखने के लिए यह दर कम से कम 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल पर होनी चाहिए। राज्य में जन्म लेने वाले बच्चों की औसत संख्या इस मानक से काफी पीछे है, जो आने वाले भविष्य के लिए बड़े आर्थिक और सामाजिक सवाल खड़े कर रही है।

तीसरे बच्चे पर इनाम की संभावना

घटती जन्म दर से निपटने के लिए तमिलनाडु सरकार अब अन्य राज्यों के मॉडल्स पर नजर टिकाए हुए है। स्वास्थ्य मंत्री केजी अरुणराज ने पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पहले से ही दंपतियों को तीसरा बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली नीतियां लागू हैं। मंत्री ने स्पष्ट किया कि हालांकि फिलहाल तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक तौर पर ऐसी किसी योजना की घोषणा नहीं की है, लेकिन भविष्य में इस दिशा में नीतिगत बदलाव करने के विकल्पों पर मंथन किया जा रहा है। सरकार का यह रुख संकेत देता है कि प्रशासन अब आबादी के गिरते आंकड़ों को रोकने के लिए पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर सोचने को तैयार है।

तेजी से बूढ़ा होता तमिलनाडु

केवल बच्चों की कम संख्या ही नहीं, बल्कि राज्य के बुजुर्गों की बढ़ती आबादी भी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु की कुल जनसंख्या का करीब 16 फीसदी हिस्सा 60 साल से अधिक उम्र के लोगों का है। कम जन्म दर और वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती तादाद का सीधा असर राज्य की भविष्य की कार्यशील आबादी यानी वर्कफोर्स पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही ट्रेंड जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में काम करने वाले युवाओं की भारी कमी हो सकती है, जिससे स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक सुरक्षा के ढांचे पर दबाव और अधिक बढ़ जाएगा।

स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा स्थिति

राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक विरोधाभासी स्थिति भी देखने को मिल रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो तमिलनाडु में 99 फीसदी प्रसव अस्पतालों में हो रहे हैं, जो संस्थागत प्रसव के मामले में राज्य की मजबूती को दर्शाता है। हालांकि, इस बीच एक और बदलाव यह आया है कि सरकारी अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलाओं की संख्या में निरंतर गिरावट दर्ज की गई है। जन्म दर में आ रही इस कमी और स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलावों को सरकार अब जन स्वास्थ्य की एक बड़ी चुनौती मानकर चल रही है। आने वाले समय में तमिलनाडु सरकार की नीतियां राज्य की डेमोग्राफी को संतुलित करने के लिए क्या कदम उठाती हैं, यह देखना काफी महत्वपूर्ण होगा।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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