चीन की अंतरिक्ष में बड़ी छलांग, खतरनाक 'किल चेन' से अमेरिका और भारत की चिंता बढ़ी चीन एक घंटा पहले 2
चीन ने रीयूजेबल रॉकेट तकनीक में महारत हासिल कर अपनी सैन्य क्षमता को कई गुना बढ़ा लिया है, जिसे रक्षा विशेषज्ञ चीन की 'किल चेन' का बॉस लेवल मान रहे हैं। इस प्रगति के बाद से दुनिया भर के रणनीतिकार सतर्क हो गए हैं क्योंकि अब युद्ध की दिशा जमीन से ऊपर अंतरिक्ष की ओर मुड़ रही है।

अंतरिक्ष तकनीक में चीन की नई और खतरनाक कामयाबी

चीन ने हाल ही में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसी बड़ी उपलब्धि हासिल की है जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिकारों को सकते में डाल दिया है। चीन की प्राइवेट स्पेस कंपनी लैंडस्पेस ने ज़ुक-3 रॉकेट बूस्टर की जमीन पर एकदम सटीक और सुरक्षित लैंडिंग कराकर सबको चौंका दिया है। इससे कुछ ही हफ्ते पहले, चीन की एक सरकारी इकाई ने समुद्र के बीचों-बीच लॉन्ग मार्च 10B रॉकेट के बूस्टर को रिकवर करने में कामयाबी पाई थी। ऊपरी तौर पर ये घटनाएं वैज्ञानिक विकास का एक हिस्सा लग सकती हैं, लेकिन असल में इसके पीछे चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA का एक बेहद खतरनाक और रणनीतिक मंसूबा छिपा हुआ है। यही कारण है कि अब भारत से लेकर अमेरिका तक के रक्षा गलियारों में हलचल मच गई है और हर कोई हाई अलर्ट मोड में है।

क्या होती है सेना की 'किल चेन'

रीयूजेबल यानी बार-बार इस्तेमाल किए जाने वाले रॉकेट की इस तकनीक के आने से चीन की सेना की 'किल चेन' अब एकदम बॉस लेवल पर पहुंच गई है। किल चेन का सीधा सा अर्थ है दुश्मन को खोजना और उसे पलक झपकते ही तबाह करने की क्षमता। आज का आधुनिक युद्ध केवल जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असली नियंत्रण अंतरिक्ष से होता है। युद्ध के मैदान में किल चेन का सिस्टम चार चरणों में काम करता है:

  • खोजना: सैटेलाइट्स की मदद से दुश्मन के टैंकों, जहाजों और सैनिकों की सटीक लोकेशन पता करना।
  • ट्रैक करना: चौबीसों घंटे कैमरों के जरिए दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना।
  • टारगेट सेट करना: हमले के लिए सटीक कोऑर्डिनेट्स तैयार करना।
  • तबाह करना: मिसाइल या ड्रोन से दुश्मन का काम तमाम करना।

अगर आज के दौर में किसी देश के पास अंतरिक्ष में मौजूद ये सैटेलाइट्स न हों, तो उसकी सेना पूरी तरह से अंधी और बहरी हो जाएगी। न तो वे आपस में संपर्क कर पाएंगे और न ही जीपीएस के जरिए अपनी मिसाइलों को सटीक निशाने पर दाग पाएंगे।

रीयूजेबल रॉकेट से चीन को क्या फायदा मिलेगा

पुराने समय में अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजना बेहद खर्चीला और मुश्किल काम था क्योंकि हर बार नया रॉकेट तैयार करना पड़ता था, जिस पर अरबों रुपये खर्च होते थे। लेकिन अब रीयूजेबल तकनीक से पूरा खेल बदल गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे चीनी सेना को तीन बड़े फायदे होंगे। पहला, युद्ध के दौरान सैटेलाइट्स को तुरंत बदलने की क्षमता। यदि कोई देश चीन के जासूसी सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में मार गिराता है, तो चीन तुरंत नए सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजकर अपने नुकसान की भरपाई कर सकेगा। दूसरा, पलक झपकते ही सैटेलाइट्स का जाल बिछाना। रीयूजेबल रॉकेट से लॉन्चिंग का खर्च 70 से 80 प्रतिशत तक कम हो जाएगा, जिससे चीन बड़ी संख्या में जासूसी सैटेलाइट्स तैनात कर सकेगा। तीसरा, ताइवान और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका पर दबाव बनाना। युद्ध की स्थिति में चीन अमेरिकी फाइटर जेट्स और एयरक्राफ्ट कैरियर्स की मूवमेंट को लाइव ट्रैक कर उन्हें आसानी से निशाना बना सकेगा।

पेंटागन की बढ़ी चिंता

चीन की इस अंतरिक्ष छलांग ने अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी पेंटागन की नींद उड़ा दी है। अमेरिकी स्पेस ऑपरेशंस के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डगलस शिएस ने अमेरिकी संसद में खुलकर चेतावनी दी है कि चीन का खतरा वास्तविक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन ने ऐसी 'किल चेन' विकसित कर ली है जो अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स और बॉम्बर्स को लंबी दूरी से ट्रैक कर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। इसका एक ट्रेलर जुलाई 2023 में देखने को मिला था, जब अमेरिका और उसके सहयोगी 'तालिसमान सेबर' सैन्य अभ्यास कर रहे थे। तब चीन ने अपने 300 सैटेलाइट्स को तैनात कर दिया था और रिपोर्ट्स के अनुसार, इन सैटेलाइट्स ने अमेरिकी सेना की गतिविधियों को देखने के लिए 3,000 से अधिक चक्कर लगाए थे।

सैटेलाइट बनाने की बड़ी फैक्ट्री

सिर्फ रॉकेट तकनीक ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए सैटेलाइट्स की भी भारी संख्या में जरूरत होती है। चीन इस दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। बीजिंग की एक रिसर्च फर्म के अनुसार, चीन में सैटेलाइट बनाने वाली दर्जनों फैक्ट्रियां हैं और 2030 तक वह हर साल हजारों सैटेलाइट्स बनाने की क्षमता हासिल कर लेगा। यह एलन मस्क की कंपनी स्पेस-एक्स को टक्कर देने और अमेरिका को उसी के मैदान में मात देने की चीन की एक बड़ी कोशिश है।

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिला बड़ा सबक

रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को दिखा दिया है कि स्पेस टेक्नोलॉजी युद्ध में कितनी बड़ी भूमिका निभाती है। यूक्रेन ने स्टारलिंक इंटरनेट की मदद से रूसी सेना के सामने कड़ी चुनौती पेश की थी। जब रूस ने यूक्रेन के मोबाइल और इंटरनेट सिस्टम को नष्ट कर दिया, तब भी स्टारलिंक ने यूक्रेनी सैनिकों को एक-दूसरे से जोड़े रखा और उन्हें रूसी टैंकों पर सटीक हमला करने में मदद की। चीन ने इस युद्ध का बारीकी से अध्ययन किया है और वह समझ चुका है कि भविष्य के युद्ध जीतने के लिए अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स का विशाल बेड़ा और उन्हें तुरंत लॉन्च करने की क्षमता कितनी जरूरी है।

अगली जंग का मैदान: अंतरिक्ष

विशेषज्ञों का मानना है कि लॉन्चिंग लागत कम होने से चीन का स्पेस सेक्टर रॉकेट की गति से आगे बढ़ेगा। भविष्य में अमेरिका और चीन के बीच अगली बड़ी जंग जमीन पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में लड़ी जाएगी। इसी वजह से चीन ने अपनी सेना में 'पीएलए एयरोस्पेस फोर्स' का गठन किया है, जो सीधे देश के सर्वोच्च सैन्य आयोग के नियंत्रण में काम करती है। यह केवल एक वैज्ञानिक सफलता नहीं है, बल्कि चीन के 21वीं सदी की सुपरपावर बनने और अमेरिकी सैन्य ताकत को कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति है। इससे भारत सहित पूरी दुनिया के लिए नई चुनौतियां पैदा हो गई हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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