चीन ने अंतरिक्ष में भेजा इंटरनेट सैटेलाइट्स का 28वां जत्था, स्टारलिंक को टक्कर देने की बड़ी तैयारी विश्व एक घंटा पहले 4
चीन ने हैनान के वाणिज्यिक अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्ग मार्च-8A रॉकेट के जरिए लो-अर्थ ऑर्बिट इंटरनेट सैटेलाइट्स का 28वां ग्रुप लॉन्च किया है। इस कदम का उद्देश्य अंतरिक्ष में विशाल सैटेलाइट नेटवर्क बनाकर स्टारलिंक का मुकाबला करना है।

ग्लोबल सैटेलाइट इंटरनेट मार्केट में अपना दबदबा बनाने के इरादे से चीन ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और बड़ा कदम उठाया है। चीन ने रविवार को अपने लॉन्ग मार्च-8A रॉकेट के जरिए लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में काम करने वाले इंटरनेट सैटेलाइट्स का 28वां ग्रुप सफलतापूर्वक लॉन्च किया। प्रक्षेपण के बाद ये सभी उपग्रह अपनी निर्धारित कक्षा में स्थापित हो गए हैं। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष में एक विशाल सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क तैयार करना है, जिसे अमेरिकी कंपनी स्पेसएक्स के स्टारलिंक नेटवर्क के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा रहा है।

हैनान से भरी उड़ान, लॉन्ग मार्च सीरीज की 674वीं सफलता

चीन की आधिकारिक समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, इस मिशन को चीन के दक्षिणी द्वीप प्रांत हैनान में स्थित वाणिज्यिक अंतरिक्ष यान लॉन्च केंद्र से अंजाम दिया गया। लॉन्ग मार्च-8A रॉकेट ने रविवार को बीजिंग के स्थानीय समयानुसार सुबह 10:03 बजे उड़ान भरी।

इस प्रक्षेपण से जुड़े मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • कक्षा की स्थिति: इस मिशन के तहत भेजे गए सभी सैटेलाइट्स धरती के निकटतम कक्षा यानी लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में तैनात किए गए हैं।
  • निर्माता संस्थान: इन अत्याधुनिक इंटरनेट उपग्रहों का निर्माण चाइना एकेडमी ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी (CAST) द्वारा किया गया है।
  • रॉकेट की उपलब्धि: यह चीन की प्रसिद्ध लॉन्ग मार्च रॉकेट सीरीज की 674वीं सफल उड़ान थी।
  • समूह का क्रम: यह इंटरनेट उपग्रहों का 28वां ग्रुप था। यहां 28वां ग्रुप लॉन्च किए जाने वाले जत्थों के क्रम को दर्शाता है, न कि इस अकेले मिशन में भेजे गए उपग्रहों की कुल संख्या को। चीन ने इस लॉन्च में शामिल उपग्रहों की सटीक संख्या उजागर नहीं की है।

अंतरिक्ष में चीन का मास्टरप्लान: गुओवांग और छियानफान प्रोजेक्ट्स

अंतरिक्ष से वैश्विक स्तर पर हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाने की होड़ में चीन बेहद आक्रामक रणनीति अपना रहा है। देश में इस उद्देश्य के लिए दो बड़े और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है:

  • गुओवांग (Guowang) प्रोजेक्ट: यह चीन की एक प्रमुख सरकारी सैटेलाइट योजना है, जिसका संबंध चाइना सैटेलाइट नेटवर्क ग्रुप से है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के तहत लो-अर्थ ऑर्बिट में करीब 13,000 सैटेलाइट्स तैनात करने की योजना बनाई गई है।
  • छियानफान (Qianfan) प्रोजेक्ट: इस प्रोजेक्ट को थाउजेंड सेल्स या स्पेससेल्स के नाम से भी जाना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य इंटरनेट सेवाओं का विस्तार करना है, जिसे एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक को सीधी टक्कर देने के प्रयास के रूप में देखा जाता है।

हालांकि, रविवार को किए गए इस विशिष्ट प्रक्षेपण की आधिकारिक घोषणा में यह जानकारी नहीं दी गई है कि यह लॉन्च गुओवांग प्रोजेक्ट के तहत हुआ है या फिर छियानफान नेटवर्क का हिस्सा है।

लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) नेटवर्क का फायदा और लेटेंसी का गणित

धरती के पास स्थित कक्षा यानी लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में उपग्रह स्थापित करके इंटरनेट सेवा देने का सबसे बड़ा फायदा सिग्नल की गति में मिलता है:

  • कम दूरी और न्यूनतम लेटेंसी: LEO सैटेलाइट्स धरती से काफी कम ऊंचाई पर होते हैं। इसके कारण डेटा सिग्नल को धरती और उपग्रह के बीच यात्रा करने में बहुत कम समय लगता है। इससे इंटरनेट इस्तेमाल करते समय लेटेंसी (सिग्नल पहुंचने में होने वाली देरी) काफी घट जाती है और यूजर को निर्बाध हाई-स्पीड कनेक्टिविटी मिलती है।
  • विशाल नेटवर्क की आवश्यकता: चूंकि ये सैटेलाइट्स धरती के करीब होते हैं, इसलिए एक सिंगल सैटेलाइट सीमित इलाके को ही कवर कर पाता है। यही वजह है कि अलग-अलग हिस्सों में लगातार और निर्बाध इंटरनेट सेवाएं देने के लिए हजारों उपग्रहों का एक पूरा नेटवर्क या कॉन्स्टलेशन तैयार करना पड़ता है।

चीन इसी रणनीति के तहत चरणबद्ध तरीके से लगातार अपने सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में भेज रहा है, ताकि वैश्विक स्तर पर अपना सैटेलाइट इंटरनेट तंत्र मजबूती से स्थापित कर सके।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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