चीन में माता-पिता का अनोखा तरीका, बच्चों को मेहनत सिखाने के लिए भेज रहे 'हार्डशिप कैंप', वसूल रहे हैं भारी फीस विश्व 10 घंटे पहले 4
चीन में आजकल माता-पिता अपने बच्चों को सुख-सुविधाओं से दूर रखकर संघर्ष सिखाने के लिए 'हार्डशिप समर कैंप' भेज रहे हैं, जहां उनसे खेत में मजदूरी कराई जाती है और इसके लिए अभिभावक खुद मोटी रकम खर्च कर रहे हैं।

चीन में बच्चों के लिए बने 'हार्डशिप कैंप'

आजकल की पीढ़ी के बच्चों को घर में तमाम तरह की सुविधाएं मिल रही हैं, जिसकी वजह से वे काफी नाजुक और कोमल होते जा रहे हैं। बच्चों को असल दुनिया की चुनौतियों से रूबरू कराने के लिए चीन में एक अजीबोगरीब चलन जोर पकड़ रहा है। यहां के माता-पिता अपने बच्चों को ऐसी जगहों पर भेज रहे हैं, जहां उन्हें कड़ी धूप में पसीना बहाना पड़ता है और शारीरिक मेहनत करनी पड़ती है। हैरानी की बात यह है कि इन कैंपों में बच्चों को भेजने के लिए माता-पिता खुद अपनी जेब से 58000 रुपये तक खर्च कर रहे हैं।

खेती और मजदूरी में बीत रही छुट्टियां

आमतौर पर गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के लिए मस्ती और गेमिंग का जरिया होती हैं, लेकिन चीन के इन कैंपों में स्थिति बिल्कुल उलट है। यहां बच्चे कंप्यूटर या स्मार्टफोन के बजाय खेतों में आलू खोदते, पेड़ों की छाल निकालते और सुअरों को खाना खिलाते नजर आते हैं। इन कठिन हालात को देखकर कई बार बच्चे रोने लगते हैं और घर जाने की गुहार लगाते हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए कई वीडियो में बच्चे यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि वे घर जाकर पढ़ाई करने को भी तैयार हैं, बस उनसे ये मजदूरी न कराई जाए।

कहां और कैसे लग रहे हैं ये कैंप?

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इन 'हार्डशिप समर कैंप' का संचालन मुख्य रूप से चीन के सिचुआन, गुइझोउ और युन्नान जैसे प्रांतों में किया जा रहा है। इन कैंपों में भर्ती होने के साथ ही बच्चों से उनके मोबाइल फोन छीन लिए जाते हैं ताकि उनका संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाए। बच्चों को मिलने वाली रोजमर्रा की सुविधाएं उनके काम करने की क्षमता और प्रदर्शन के आधार पर तय की जाती हैं।

क्या है इन कैंपों की भारी फीस?

इन कैंपों की फीस सुनकर आप दंग रह जाएंगे। महज 10 दिन के अनुभव के लिए माता-पिता को 4,000 युआन यानी लगभग 58000 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। यदि बच्चे को एक महीने तक वहां रखा जाता है, तो यह खर्च 10,000 युआन के आंकड़े को भी पार कर सकता है। अनुशासन इतना सख्त है कि अगर कोई बच्चा काम पूरा करने में कोताही बरतता है, तो उसे सजा के तौर पर केवल आलू खाकर ही गुजारा करना पड़ता है।

अभिभावकों की सोच और तर्क

माता-पिता का मानना है कि शहर की आरामदायक जिंदगी ने बच्चों को मेहनत की अहमियत भुलाना दी है। वे चाहते हैं कि बच्चे यह समझें कि पैसा कमाना और जीवन की गाड़ी खींचना कितना कठिन होता है। कैंप के दौरान बच्चों से अपने माता-पिता के नाम पत्र भी लिखवाए जाते हैं, जिसे पढ़कर कई अभिभावक भावुक हो जाते हैं। कुछ माता-पिता इसे एक अच्छा निवेश मानते हैं, उनका कहना है कि इससे बच्चों में लचीलापन और मेहनत के प्रति सम्मान पैदा होता है।

क्या हर बच्चे पर इसका असर पड़ रहा है?

सभी अभिभावकों का अनुभव एक जैसा नहीं है। एक पिता ने साझा किया कि उनकी बेटी ने शुरुआत में बहुत शिकायतें कीं, लेकिन बाद में उसे मिट्टी और खेतों में काम करना अच्छा लगने लगा। हालांकि, शंघाई की एक मां ने बताया कि 10 दिन के शिविर के बाद भी उनकी सात साल की बेटी के व्यवहार में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया, हालांकि उन्हें इस बात की तसल्ली थी कि उसने अपनी सुविधा से हटकर कुछ नया सीखा।

विशेषज्ञों की राय और चिंताएं

इन शिविरों को लेकर समाज में एक तीखी बहस छिड़ी हुई है। एक वर्ग का मानना है कि बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए थोड़ी कठिनाई का सामना करना जरूरी है, ताकि वे जीवन के वास्तविक धरातल को समझ सकें। वहीं, दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि बच्चों पर इस प्रकार का मानसिक और शारीरिक दबाव डालना उनके कोमल मन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। उनका मानना है कि कठोरता और अनुशासन के नाम पर बच्चों के बचपन को छीनना उनके भविष्य के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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