तिब्बत में बौद्ध आस्था पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का कड़ा पहरा, भिक्षुओं को 'सरकारी कर्मचारी' बनाने की खतरनाक साजिश विश्व 3 महीने पहले 133
एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि चीन तिब्बत में बौद्ध धर्म की आध्यात्मिक पहचान मिटाकर इसे राजनीतिक नियंत्रण और कम्युनिस्ट विचारधारा को फैलाने का हथियार बना रहा है।

बौद्ध धर्म के उद्गम स्थल के पड़ोस में स्थित चीन पर अब बौद्ध आस्था और आध्यात्मिक परंपराओं को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए मोहरा बनाने के बेहद गंभीर आरोप लगे हैं। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में यह सनसनीखेज दावा किया गया है कि चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी बौद्ध धर्म को एक पवित्र आध्यात्मिक मार्ग के रूप में नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक नियंत्रण और वैचारिक प्रभुत्व को मजबूत करने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रही है। तिब्बत जैसे क्षेत्रों में, जहां बौद्ध धर्म वहां के लोगों की पहचान और जीवनशैली की मुख्य आत्मा है, चीन इसे एक बड़े खतरे के रूप में देखता है और इसे कुचलने की कोशिश कर रहा है।

आस्था नहीं, राजनीतिक नियंत्रण का जरिया

इस पूरे मामले का विस्तृत ब्योरा 'यूरोपियन टाइम्स' में प्रकाशित एक खोजी लेख में सामने आया है, जिसे प्रसिद्ध लेखक खेदरूब थोंडुप ने लिखा है। थोंडुप के विश्लेषण के अनुसार, चीन का बौद्ध धर्म के प्रति रवैया किसी वास्तविक श्रद्धा या आस्था पर नहीं, बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक उपयोगिता पर आधारित है। हालांकि चीन का प्रशासन संवैधानिक रूप से खुद को नास्तिक घोषित करता है, लेकिन इसके बावजूद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) धर्म को केवल तभी तक स्वीकार करती है, जब तक उसे देश के पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने, सांस्कृतिक विरासत का दिखावा करने या समाजवाद के प्रचार-प्रसार के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग किया जा सके।

रिपोर्ट में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि तिब्बत में ऐतिहासिक महत्व के पवित्र बौद्ध मंदिरों को अब धीरे-धीरे विशुद्ध रूप से पर्यटन केंद्रों में बदला जा रहा है। वहां रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं को अब स्वतंत्र धार्मिक साधकों के बजाय सरकारी कर्मचारियों की तरह काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उनके हर कदम पर प्रशासन की कड़ी नजर रहती है और धार्मिक ग्रंथों को भी इस तरह से तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है जिससे कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादारी को बढ़ावा दिया जा सके।

पुनर्जन्म पर बीजिंग का दावा और दलाई लामा की निष्ठा पर रोक

बीजिंग प्रशासन ने बौद्ध धर्म की सबसे पवित्र और प्राचीन मान्यताओं में भी हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन सरकार का यह दावा है कि तिब्बती बौद्ध धर्म के लामाओं और यहां तक कि भविष्य के दलाई लामा के पुनर्जन्म को मंजूरी देने का अंतिम और कानूनी अधिकार केवल उसके पास है। इस कदम को तिब्बती बौद्ध परंपरा को उसकी आध्यात्मिक जड़ों से काटकर पूरी तरह से राज्य के अधीन लाने की एक सुनियोजित साजिश के रूप में देखा जा रहा है।

इसके साथ ही, तिब्बत के भीतर दलाई लामा के प्रति किसी भी तरह की निष्ठा या सम्मान प्रकट करना एक गंभीर कानूनी अपराध घोषित कर दिया गया है। जो लोग सार्वजनिक रूप से दलाई लामा के प्रति आस्था व्यक्त करते हैं, उन्हें चीनी प्रशासन देशद्रोही और अपराधी की तरह देखता है और उनके खिलाफ कठोर दमनकारी कार्रवाई की जाती है।

मठों पर कड़ा पहरा और 'देशभक्ति शिक्षा'

तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता को दबाने के लिए बौद्ध मठों पर चौबीसों घंटे कड़ी निगरानी रखी जा रही है। भिक्षुओं को अनिवार्य रूप से 'देशभक्ति शिक्षा' के कड़े सत्रों से गुजरना पड़ता है, जहां उन्हें धार्मिक शिक्षाओं के बजाय कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक विचारधारा का पाठ पढ़ाया जाता है।

पारंपरिक बौद्ध अनुष्ठानों, प्रार्थना सभाओं, त्योहारों और बुनियादी धार्मिक शिक्षाओं पर बेहद कड़े प्रतिबंध लागू कर दिए गए हैं। कई ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं का आध्यात्मिक महत्व कम करने के लिए उन्हें जानबूझकर केवल 'लोक संस्कृति' के रूप में पेश किया जा रहा है, जिससे उनका धार्मिक अस्तित्व कमजोर पड़ सके।

दुनिया के सामने दोहरी नीति का खेल

एक तरफ जहां तिब्बत के भीतर बौद्ध धर्म की पहचान मिटाने की हर संभव कोशिश की जा रही है, वहीं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन खुद को बौद्ध विरासत का सबसे बड़ा रक्षक साबित करने की कोशिश करता है। अपनी वैश्विक छवि को चमकाने के लिए चीनी सरकार बड़े पैमाने पर बौद्ध मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम करवा रही है।

इसके साथ ही, चीन अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों का आयोजन करता है और थाईलैंड, श्रीलंका तथा म्यांमार जैसे बौद्ध बहुल देशों में सरकारी सहयोग से तीर्थयात्राओं को बढ़ावा देता है। यह दोहरी नीति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि चीन विदेशों में प्रभाव बढ़ाने के लिए बौद्ध धर्म का उपयोग एक राजनयिक हथियार के रूप में कर रहा है, जबकि अपने देश के भीतर वह इसे कुचल रहा है।

लेख के अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि तिब्बत में बौद्ध आस्था पर यह बढ़ता हुआ सरकारी नियंत्रण वास्तव में वहां की अनूठी तिब्बती संस्कृति, पहचान और किसी भी प्रकार की असहमति को दबाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, किसी भी समुदाय की गहरी और सच्ची आस्था को केवल राजनीतिक बल या दमन के जरिए पूरी तरह नियंत्रित कर पाना संभव नहीं है, और यही अटूट आस्था चीनी सरकार की इस कठोर नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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