बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
कम समय में अधिक मुनाफा
आज के दौर में जब किसान पारंपरिक खेती से हटकर नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, बिहार के सारण जिले के रहने वाले टिंकू कुमार कुशवाहा ने एक शानदार उदाहरण पेश किया है। मांझी प्रखंड के जैतपुर गांव के निवासी टिंकू ने खेती को एक लाभ का व्यवसाय बना लिया है। वे मूली जैसी नगदी फसलों की खेती करके अपनी आमदनी को नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं। उनकी मेहनत और आधुनिक सोच का ही नतीजा है कि वे अब क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं।
खेती का गणित और लागत
टिंकू बताते हैं कि मूली की खेती का सबसे बड़ा फायदा इसका कम समय चक्र है। यह फसल मात्र 25 से 35 दिनों में पूरी तरह तैयार हो जाती है। एक एकड़ भूमि पर मूली की बुवाई करने में कुल खर्च करीब 20 से 25 हजार रुपये का आता है। वहीं बाजार में सही मांग होने पर इससे 2 लाख रुपये से अधिक की शानदार कमाई हो जाती है। यह मुनाफा पारंपरिक अनाज की खेती के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।
कृषि वैज्ञानिकों से लिया प्रशिक्षण
शुरुआत में टिंकू अपने पिता के साथ केवल पारंपरिक तरीके से ही खेती करते थे, जिसमें कमाई का दायरा सीमित था। बदलाव तब आया जब उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क किया और उनसे आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने अपना दायरा बढ़ाया और अब वे 10 बीघे से ज्यादा जमीन पर नगदी फसलों की खेती कर रहे हैं। अपनी मेहनत के दम पर वे पहले भी 16 कट्ठा मूली बेचकर सभी खर्च निकालने के बाद 1 लाख 60 हजार रुपये का शुद्ध लाभ कमा चुके हैं।
बीज का चयन और तकनीक
टिंकू वर्ष 2016 से लगातार नगदी फसलों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वर्तमान सीजन में उन्होंने डेढ़ बीघे जमीन पर मूली लगाई है। इसमें से 15 कट्ठे की फसल को वे पहले ही 25 से 30 रुपये प्रति किलो की दर से बाजार में बेच चुके हैं। अपने खेतों में वे सिजेंटा कंपनी के बीजों का इस्तेमाल करते हैं, जिसे वे बेहतर उत्पादन का मुख्य कारण मानते हैं। खास बात यह है कि उन्होंने बचे हुए 15 कट्ठे के खेत में केले के साथ मूली की मिश्रित खेती भी की है, जिससे जमीन का अधिकतम उपयोग हो सके।
किसानों के लिए संदेश
युवा किसान टिंकू कुमार कुशवाहा का मानना है कि यदि किसान सही योजना और कम समय में तैयार होने वाली नगदी फसलों का चयन करें, तो उनकी आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार हो सकता है। वे न केवल अपने परिवार की आय बढ़ा रहे हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी यह सिखा रहे हैं कि कैसे तकनीक और मेहनत के सही मेल से खेती को घाटे का सौदा होने से बचाया जा सकता है।
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