बिहार
3 घंटे पहले
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बिहार के छपरा जिले में जैविक कृषि के क्षेत्र में एक किसान ने अपनी अनूठी पहचान बनाई है। मांझी प्रखंड के शीतलपुर गांव के रहने वाले बागेंद्र महतो परंपरागत खेती से अलग हटकर आधुनिक और जैविक तरीकों को अपना रहे हैं। उनके इस प्रयास ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है। बागेंद्र बड़े पैमाने पर नकदी फसलों की खेती करने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की सब्जियों की नर्सरी भी तैयार करते हैं।
खुद के बीजों से तैयार होती है नर्सरी
बागेंद्र महतो की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे बाजार से महंगे बीज खरीदने के बजाय खुद ही बीज तैयार करते हैं। इन स्वदेशी बीजों की मदद से वे अपनी नर्सरी में सब्जियों के बेहतरीन पौधे उगाते हैं। उनकी इस नर्सरी में मुख्य रूप से निम्नलिखित सब्जियों के पौधे तैयार किए जाते हैं:
- बैंगन के उन्नत पौधे
- टमाटर की विभिन्न किस्में
- तीखी और हरी मिर्च
- अन्य मौसमी सब्जियां
इन पौधों को वे अन्य किसानों को बेचते हैं, जिससे क्षेत्र के अन्य किसानों को भी गुणवत्तापूर्ण पौधे आसानी से मिल जाते हैं। खुद बीज तैयार करने के कारण उनकी उत्पादन लागत भी काफी कम हो जाती है।
'जीवामृत' खाद है सफलता की कुंजी
बागेंद्र अपनी फसलों में किसी भी तरह के रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं करते हैं। इसके स्थान पर वे पूरी तरह से जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं। वे अपने खेत के लिए खुद ही विशेष जीवामृत खाद तैयार करते हैं। इस प्राकृतिक खाद को बनाने के लिए वे मुख्य रूप से इन घरेलू चीजों का उपयोग करते हैं:
- गोबर
- गुड़
- बेसन
- पानी
इन सभी सामग्रियों को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर जीवामृत तैयार किया जाता है, जो मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है और फसलों को बीमारियों से बचाता है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान
कृषि के क्षेत्र में उनके इस सराहनीय योगदान और अभिनव प्रयासों के लिए बागेंद्र महतो को कई बार सम्मानित किया जा चुका है। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक तब आई, जब वर्ष 2025 में उन्हें देश के प्रधानमंत्री की ओर से भी इस उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल बागेंद्र के लिए बल्कि पूरे छपरा जिले के किसानों के लिए गर्व का विषय है।
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