पंजाब
एक घंटा पहले
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पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान
हर साल धान की कटाई के बाद पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली जलाए जाने से उठने वाला धुआं दिल्ली और एनसीआर के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। इस धुएं के कारण पूरे क्षेत्र में जहरीली धुंध की चादर बिछ जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत और गंभीर प्रदूषण की स्थिति पैदा हो जाती है। हालांकि, अब इस संकट से निपटने के लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई दी है। एक नई कृषि तकनीक के माध्यम से अब किसानों को पराली जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, बल्कि वे इसी पराली का उपयोग करके आलू की फसल उगा सकेंगे।
नई तकनीक से किसानों को होगा दोहरा लाभ
यह शोध विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा के उन किसानों के लिए एक बड़ी राहत है जो फसल अवशेष प्रबंधन की समस्या से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, खेतों में मौजूद पराली को नष्ट करने के बजाय, उसमें सीधे आलू की खेती की जा सकती है। इस पद्धति के कई प्रमुख फायदे सामने आए हैं:
- पानी की बचत: आलू की इस तकनीक से सिंचाई में लगने वाले पानी की खपत में 50 प्रतिशत तक की कमी आती है।
- पैदावार में बढ़ोतरी: पारंपरिक खेती की तुलना में आलू की उत्पादकता में 25 से 50 प्रतिशत तक की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
- आलू की गुणवत्ता: पराली में उगाए गए आलू मिट्टी के संपर्क में कम आते हैं, जिसके कारण उनकी गुणवत्ता बेहतर रहती है और वे लंबे समय तक खराब नहीं होते।
केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान, भुवनेश्वर की विशेषज्ञ डॉ. सुकांता कुमार षडंगी का दावा है कि इस तरीके से उगाया गया आलू बिना किसी केमिकल स्प्रे के भी 4 से 6 महीने तक ताजा बना रहता है। यह खोज न केवल पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकेगी, बल्कि किसानों के लिए धान के बाद एक अतिरिक्त आय का जरिया भी बनेगी।
शोध और भविष्य की संभावनाएं
इस अभिनव तकनीक को विकसित करने वाली डॉ. सुकांता कुमार षडंगी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत आने वाले सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर वूमेन इन एग्रीकल्चर, भुवनेश्वर में प्रिंसिपल साइंटिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। वे वहां महिलाओं के लिए कृषि प्रौद्योगिकी विभाग के हेड डिवीजन का नेतृत्व भी करती हैं।
हाल ही में भुवनेश्वर में आयोजित एक मीडिया एक्सचेंज कार्यक्रम के दौरान, डॉ. सुकांता ने पीआईबी चंडीगढ़ की उपस्थिति में इस शोध के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि इस तकनीक पर कई राज्यों में प्रयोग किए गए हैं और इसके परिणाम अत्यंत सकारात्मक रहे हैं। यह तकनीक न केवल पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाने में मदद करेगी, बल्कि इससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता और स्वास्थ्य में भी सुधार देखने को मिल रहा है।
संस्थान का योगदान
भुवनेश्वर स्थित केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान भारत का एकमात्र ऐसा प्रमुख संस्थान है जो विशेष रूप से कृषि के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और उनके कौशल को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। डॉ. सुकांता द्वारा की गई यह खोज पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाता है, तो दिल्ली की हवा को जहरीला बनाने वाली पराली की समस्या का समाधान हो सकता है और किसानों की आर्थिक स्थिति में भी बड़ा बदलाव आ सकता है।
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