भारत
46 मिनट पहले
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सरकार उठाएगी बड़ा कदम
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC के नियमों पर अब केंद्र सरकार एक बार फिर मंथन करने की तैयारी में है। सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देते हुए स्पष्ट किया है कि वह इन विवादित नियमों पर पुनर्विचार करने जा रही है। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और नियमों की समीक्षा करने के लिए केंद्र सरकार एक नई कमेटी का गठन करेगी।
मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को विश्वास दिलाया कि सरकार छात्रों के सभी वर्गों के हितों को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि ऐसे कदम उठाए जाएंगे ताकि किसी भी वर्ग का विद्यार्थी खुद को असुरक्षित या भयभीत महसूस न करे। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि देश की युवा पीढ़ी का भविष्य और उनके हित सर्वोपरि हैं, और कोई भी नियम बनाते समय इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का रुख
इससे पहले हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इन विवादित नियमों के क्रियान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी थी। कोर्ट के सामने दायर की गई याचिकाओं में यह तर्क दिया गया था कि यूजीसी द्वारा लाए गए नियम भेदभावपूर्ण हैं और ये सामान्य वर्ग के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सीधे तौर पर उल्लंघन करते हैं। कोर्ट का मानना था कि नियमों की शब्दावली अस्पष्ट है, जिसके चलते इनका गलत इस्तेमाल होने की पूरी संभावना है। कोर्ट ने ही सरकार को सुझाव दिया था कि वे इन प्रावधानों पर फिर से विचार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाएं।
विवाद की जड़ और नियम
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला मामले की सुनवाई के दौरान उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करने के लिए ठोस नियम बनाने का निर्देश दिया था। उसी निर्देश का पालन करते हुए यूजीसी ने नए नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में 'समता कमेटी' का गठन अनिवार्य किया गया। इस कमेटी का मुख्य कार्य जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को सुनना था। नए नियमों में ओबीसी वर्ग को भी शिकायत करने का अधिकार दिया गया, जो पहले केवल एससी और एसटी वर्ग तक सीमित था। हालांकि, कमेटी के गठन में सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं किया गया, जो विवाद का एक मुख्य बिंदु बन गया। इसके अलावा, झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले पुराने प्रावधान को भी इन नए नियमों से हटा दिया गया था।
बीते 13 जनवरी को यूजीसी द्वारा इन नियमों को जारी किया गया था, जिसके बाद से सामान्य वर्ग के छात्रों और अन्य समूहों में काफी नाराजगी देखी गई। विरोध करने वालों का कहना है कि भेदभाव की परिभाषा इस तरह तैयार की गई है, मानो जातिगत प्रताड़ना केवल आरक्षित वर्गों के साथ ही होती है। सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को किसी भी तरह का संस्थागत सुरक्षा कवच नहीं दिया गया है। फिलहाल, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने इन नियमों के अमल पर रोक बरकरार रखी है और सरकार की अगली कार्रवाई पर सबकी नजर है।
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