मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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बुरहानपुर में कायम है गंगा जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल
मध्य प्रदेश का बुरहानपुर जिला अपनी ऐतिहासिक धरोहर के साथ साथ आपसी भाईचारे और गंगा जमुनी तहजीब के लिए पूरे देश में जाना जाता है। इस जिले की खासियत यह है कि यहां विभिन्न समुदायों के लोग न केवल शांतिपूर्वक एक साथ रहते हैं, बल्कि एक दूसरे के त्योहारों और परंपराओं में भी पूरे उत्साह के साथ शामिल होते हैं। इसी सद्भाव की एक जीवंत कहानी बुरहानपुर के एक ऐसे परिवार की है, जो पिछले 5 पीढ़ियों से अपने घर पर ताजिया और सवारी बैठाने की परंपरा को बखूबी निभा रहा है।
परदादा से शुरू हुई थी यह अनूठी सेवा
इस परिवार के सदस्य अशोक निमाड़कर और धर्मेंद्र निमाड़कर ने अपनी इस पारिवारिक विरासत के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि वे इस परंपरा को अपनी 5वीं पीढ़ी में आगे बढ़ा रहे हैं। उनके अनुसार, बुरहानपुर जिले में सबसे पहले ताजिया बनाने की शुरुआत उनके परदादा कल्लू बटाना ने की थी। उनके द्वारा डाली गई इस नींव के बाद से ही घर में ताजिया बनाने और उसे बैठाने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज भी बिना किसी रुकावट के जारी है। निमाड़कर परिवार का कहना है कि उस समय काफी बड़े और भव्य ताजिये बनाए जाते थे और आज भी उनके घर में बिल्कुल उसी आकार और तरीके से ताजिया तैयार किया जाता है, जैसा उनके परदादा ने शुरू किया था।
श्रद्धा का केंद्र है निमाड़कर परिवार का घर
यह आयोजन केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है। निमाड़कर परिवार द्वारा घर पर ताजिया और सवारी बैठाने के दौरान दूर दूर से लोग जियारत करने के लिए पहुंचते हैं। इस दौरान 5 दिन तक विशेष दुआएं की जाती हैं। परिवार का मुख्य उद्देश्य इस माध्यम से एकता और सद्भावना का संदेश फैलाना है। स्थानीय लोगों के बीच इस स्थान का विशेष महत्व है और लोग यहां बड़ी श्रद्धा के साथ अपनी मन्नतें लेकर आते हैं।
मन्नतें पूरी होने पर बांटा जाता है प्रसाद
विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना करने वाले लोग यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं और मन्नत मांगते हैं। परिवार का दावा है कि यहां आने वाले लोगों की मन्नतें खाली नहीं जाती हैं। जब लोगों की मन्नतें पूरी हो जाती हैं, तो वे आभार व्यक्त करने के लिए विशेष रूप से सिरनी और खिचड़ी का प्रसाद चढ़ाते हैं। मोहर्रम के अवसर पर मनाया जाने वाला यह आयोजन पूरे इलाके में भाईचारे का उदाहरण पेश करता है। 5 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में निमाड़कर बंधु पूरी तत्परता के साथ सेवा कार्य में जुटे रहते हैं, जिससे बुरहानपुर की सांस्कृतिक विरासत और अधिक समृद्ध होती है। यह परिवार आज भी अपनी पुरानी परंपराओं को संजोकर समाज को जोड़ने का काम कर रहा है।
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