राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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विचारों
ब्रिक्स समिट 2026 और भारत की कूटनीतिक चुनौती
साल 2026 में होने वाला ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन भारत की विदेश नीति के लिए एक बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक और ऊर्जा संबंधों को कैसे कायम रखता है और चीन के साथ सीमा पर चल रहे तनाव के बीच आर्थिक संवाद को किस दिशा में ले जाता है।
अमेरिका बनाम ब्रिक्स का संतुलन
भारत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण रक्षा, प्रौद्योगिकी और निवेश साझेदार है। ऐसी स्थिति में भारत के सामने यह जटिल प्रश्न है कि वह ब्रिक्स मंच को किसी विशेष देश या गुट के प्रभाव में आने से कैसे रोके। भारत की कोशिश है कि:
- ब्रिक्स को किसी भी स्थिति में अमेरिका विरोधी मंच न बनने दिया जाए।
- समूह के भीतर चीन के बढ़ते प्रभुत्व को संतुलित किया जाए।
- ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती के साथ दुनिया के सामने रखा जाए।
रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा
दिल्ली में आयोजित होने वाला यह शिखर सम्मेलन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को परखने वाला एक बड़ा मंच होगा। जहां एक ओर रूस के साथ भारत की वर्षों पुरानी दोस्ती है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर संवाद करना देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। भारत का मुख्य उद्देश्य ब्रिक्स को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के एक ऐसे स्तंभ के रूप में स्थापित करना है, जो सभी सदस्य देशों के हितों का ध्यान रखे और किसी एक देश की महत्वाकांक्षा का साधन न बने।
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