राहुल देव बर्मन: वह संगीतकार जो बोतल और कंघी से भी रच देते थे अमर धुनें मनोरंजन एक महीने पहले 61
महान संगीतकार आरडी बर्मन उर्फ पंचम दा ने अपनी अनोखी प्रयोगधर्मिता से भारतीय संगीत को एक नई पहचान दी। कांच की प्याली से लेकर खाली बोतल तक, हर साधारण चीज से धुन निकालने वाले इस जादूगर की विरासत आज भी करोड़ों दिलों में धड़कती है।

संगीत की दुनिया के असली जादूगर

भारतीय सिनेमा के इतिहास में बहुत कम ऐसे नाम हैं जिन्होंने संगीत की परिभाषा को इतने करीब से बदला है, जितना राहुल देव बर्मन ने। दुनिया उन्हें प्यार से पंचम दा के नाम से जानती है। वे सिर्फ एक संगीतकार नहीं थे, बल्कि वे धुन और ताल के साथ नए प्रयोग करने वाले एक ऐसे कलाकार थे जिनकी सोच अपने समय से कहीं आगे थी। पंचम दा का मानना था कि संगीत के लिए केवल महंगे वाद्ययंत्रों की जरूरत नहीं होती, बल्कि ब्रह्मांड की हर आवाज में संगीत छिपा होता है। चाहे वह कांच की टकराहट हो, खाली बोतल की गूंज हो, या फिर कंघी के चलने की आवाज, उन्होंने इन सब से सदाबहार संगीत तैयार किया।

संगीत विरासत में मिला

पंचम दा का जन्म 27 जून 1939 को कोलकाता में हुआ था। उन्हें संगीत विरासत में अपने पिता सचिन देव बर्मन यानी एसडी बर्मन से मिला, जो उस दौर के सबसे सम्मानित संगीतकारों में से एक थे। पंचम दा की अद्भुत प्रतिभा बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज नौ साल की उम्र में उन्होंने फिल्म फंटूश के लिए ऐ मेरी टोपी पलट के आ जैसी धुन तैयार कर ली थी। जब वे मुंबई आए, तो उन्होंने पहले अपने पिता के सहायक के तौर पर काम सीखा। हालांकि, जल्द ही उन्होंने एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अपनी एक ऐसी अलग पहचान बनाई जिसने पूरे भारत को अपना दीवाना बना लिया।

सफलता का सफर और जादुई तिकड़ी

पंचम दा को फिल्म जगत में असली और बड़ा ब्रेक फिल्म तीसरी मंजिल के गाने आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा से मिला। इसके बाद उनके करियर में सुपरहिट गानों की झड़ी लग गई। दम मारो दम और ये शाम मस्तानी जैसे गानों ने उन्हें बॉलीवुड का सबसे चर्चित और ट्रेंड-सेटिंग संगीतकार बना दिया। 1970 और 80 के दशक में राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आरडी बर्मन की तिकड़ी ने भारतीय संगीत को मेरे सपनों की रानी और चिंगारी कोई भड़के जैसे अमर गाने दिए। यह वह दौर था जब संगीत की दुनिया में पंचम दा का नाम ही सफलता की गारंटी माना जाता था।

आम चीजों से तैयार असाधारण संगीत

पंचम दा की सबसे बड़ी खासियत उनका प्रयोगवादी अंदाज था। वे अपनी धुन में नयापन लाने के लिए घर के सामान का इस्तेमाल करने में कभी नहीं हिचकिचाते थे। उन्होंने फिल्म शोले के सदाबहार गाने महबूबा महबूबा में खाली बोतल में फूंक मारकर एक अनोखी रिदम पैदा की थी, जो आज भी संगीत प्रेमियों के जेहन में ताजा है। वहीं, फिल्म यादों की बारात के सुपरहिट गाने चुरा लिया है में उन्होंने कांच की प्याली और चम्मच के टकराने से जो संगीत तैयार किया, वह आज भी कानों में रस घोलता है। इतना ही नहीं, फिल्म पड़ोसन के मशहूर गाने एक चतुर नार में उन्होंने कंघी की खुरदुरी सतह को घिसकर जो साउंड इफेक्ट दिया, वह अपने आप में एक मिसाल है।

अमर है पंचम दा की विरासत

80 के दशक के बाद उनके करियर और स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आए, लेकिन संगीत के प्रति उनकी लगन में कोई कमी नहीं आई। ढलते दौर में भी उन्होंने आने वाला पल जाने वाला है और तुझसे नाराज नहीं जिंदगी जैसे बेहद संजीदा और दिल को छू लेने वाले गाने दिए। फिल्म 1942: ए लव स्टोरी में संगीत देकर उन्होंने साबित कर दिया कि उनका हुनर समय की सीमाओं से परे है। इस फिल्म के गाने एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा और रिमझिम रिमझिम आज की पीढ़ी के भी फेवरेट हैं। दुखद यह है कि 4 जनवरी 1994 को दुनिया को अलविदा कहने वाले पंचम दा अपनी इस आखिरी ब्लॉकबस्टर फिल्म की सफलता का जश्न देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका संगीत आज भी अमर है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

आन्या कपूर पाबना के मनोरंजन रिपोर्टर हैं, जो बॉलीवुड, ओटीटी और टेलीविजन की खबरें कवर करते हैं। फिल्मों, वेब सीरीज, सेलिब्रिटी और बॉक्स ऑफिस पर उनकी पैनी नजर रहती है। वे मनोरंजन जगत की हलचल को रोचक अंदाज में दर्शकों तक लाते हैं।

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