नवाज और विजय राज को थिएटर में बनना पड़ता था 'पेड़', मनोज बाजपेयी ने सुनाए दिलचस्प किस्से मनोरंजन एक दिन पहले 5
मनोज बाजपेयी ने अपने थिएटर के दिनों को याद करते हुए बताया कि शुरुआत में रोल न मिलने पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज को एक नाटक में ढाई-ढाई घंटे पेड़ बनकर खड़ा रहना पड़ता था।

हिंदी सिनेमा के कई दिग्गज कलाकारों ने अपने सफर की शुरुआत रंगमंच से की और वहीं रहकर अपने अभिनय को तराशा। इसी कड़ी में मनोज बाजपेयी ने हाल ही में अपने थिएटर के शुरुआती दौर के कुछ बेहद मजेदार किस्से साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे शुरुआत में किरदार न मिलने की वजह से नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज को एक नाटक में ढाई घंटे तक सिर्फ पेड़ बनकर खड़ा रहना पड़ता था। मनोज की दिन-रात चलने वाली कड़ी रिहर्सल देखकर दोनों इतने हैरान थे कि अभिनय को 'गधा मजदूरी' समझकर इसे छोड़ने तक की सोचने लगे थे।

संघर्ष से निकले तीन सितारे

मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज आज हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में शामिल हैं, जिनके अभिनय की हर कोई तारीफ करता है। लेकिन कामयाबी की इस ऊंचाई तक पहुंचने से पहले इन तीनों ने भारी संघर्ष झेला। मनोज ने हाल ही में पुराने दिनों का एक रोचक किस्सा सुनाते हुए नवाज और विजय के रंगमंच के दिनों को याद किया।

जब डायरेक्टर ने बना दिया 'पेड़'

मनोज ने बताया कि काम की तलाश में जब नवाजुद्दीन और विजय राज एक बड़े थिएटर के निर्देशक से मिलने पहुंचे, तो उन्होंने दोनों का बैकग्राउंड और अभिनय करने की वजह पूछी। दिक्कत यह थी कि नाटक में कोई किरदार खाली ही नहीं था। ऐसे में निर्देशक ने जुगाड़ निकालते हुए कह दिया कि नाटक में पेड़ों की जरूरत है, इसलिए इन दोनों को ही पेड़ बना दिया जाए।

'फीवर एफएम' को दिए इंटरव्यू में मनोज बताते हैं कि मंच पर पेड़ बनने वाले सिर्फ ये दोनों ही नहीं थे, बल्कि सात-आठ लोगों का पूरा समूह था। इन भावी सुपरस्टार्स को नाटक के दौरान ढाई-ढाई घंटे तक बिना हिले-डुले सीधे खड़े रहना पड़ता था। जो कलाकार बनने का सपना लेकर आए थे, उन्हें मंच पर लकड़ी की तरह खड़ा कर दिया गया था।

रिहर्सल देखकर हिल गया हौसला

किस्सा यहीं खत्म नहीं होता। मनोज बाजपेयी उस वक्त थिएटर में दिन-रात पागलों की तरह रिहर्सल किया करते थे। उनकी इस मेहनत को देखकर नवाजुद्दीन और विजय राज के होश उड़ गए और उन्हें अभिनय चुनने के अपने फैसले पर ही शक होने लगा। दोनों सोचने लगे कि क्या स्टार बनने का रास्ता वाकई इतना कठिन होता है।

मनोज ने हंसते हुए बताया कि नवाज और विजय अक्सर बाहर जाकर आपस में बात करते थे और उन्हें देखकर कहते थे, 'यार, ये आदमी तो इतनी गधा मजदूरी कर रहा है, क्या अभिनय में सचमुच इतनी घिसाई करनी पड़ती है?' मनोज की कड़ी रिहर्सल देखकर दोनों एक बार तो अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर वापस लौटने का मन तक बना चुके थे।

जब दोनों बन गए 'पनौती'

मजेदार मोड़ तब आया, जब ये दोनों कलाकार निर्देशक के लिए 'पनौती' साबित हो गए। हुआ यूं कि एक बार निर्देशक जोश में आकर निर्देशन दे रहे थे और अचानक इन दोनों से टकराकर जोर से गिर पड़े। चोट इतनी गहरी थी कि उनके हाथ में स्क्रू तक लगवाने पड़ गए।

इसके बाद थिएटर के बाकी लोग निर्देशक को चिढ़ाने लगे कि ये दोनों लड़के उनके लिए पनौती हैं। हालत यह हो गई कि उस हादसे के बाद निर्देशक पूरे नाटक में सिर्फ अपने एक हाथ से ही निर्देश दे पाते थे। आज भी जब ये तीनों इस घटना को याद करते हैं तो हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं।

संघर्ष ने गहरी की दोस्ती

मनोज बाजपेयी कहते हैं कि पेड़ बनने और 'गधा मजदूरी' वाले उन्हीं दिनों ने उनकी दोस्ती को मजबूत बना दिया। ये तीनों सिर्फ काम के साथी नहीं थे, बल्कि साथ सफर करते थे, एक ही हॉल में सोते थे और मेस या ढाबे पर जो मिलता, मिल-बांटकर खाते थे। संघर्ष के उसी दौर ने आज उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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