छत्तीसगढ़ का अनूठा त्योहार 'कमरछठ': जानिए संतान की लंबी आयु और प्रकृति से जुड़े इस पारंपरिक लोकपर्व का महत्व छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 5
छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और कृषि जीवन को दर्शाने वाला ऐतिहासिक लोकपर्व 'कमरछठ' पूरे राज्य में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है, जिसमें मातृत्व, जल संरक्षण और पर्यावरण का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

छत्तीसगढ़ की पावन भूमि पर कई ऐसे त्योहार मनाए जाते हैं जो न केवल धार्मिक आस्था को प्रदर्शित करते हैं, बल्कि मनुष्य का प्रकृति, मिट्टी और अपनी संतानों के साथ गहरे जुड़ाव को भी रेखांकित करते हैं। इन्हीं पावन और विशिष्ट लोकपर्वों में से एक प्रमुख पर्व है कमरछठ। इसे राज्य के विभिन्न हिस्सों में हलछठ, हलषष्ठी या फिर हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर सहित तमाम जिलों में इस पर्व को लेकर महिलाओं में भारी उत्साह देखने को मिलता है। इस अनूठे त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मातृत्व की ममता, अपनी संतान की मंगलकामना, कृषि संस्कृति का सम्मान, जल संरक्षण की महत्ता और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, ये सभी तत्व एक साथ समाहित नजर आते हैं। आधुनिकता के इस दौर में भी छत्तीसगढ़ की माताएं इस पारंपरिक अनुष्ठान को पूरे नियम और अटूट विश्वास के साथ निभा रही हैं।

कृषि संस्कृति और जनजीवन का गहरा जुड़ाव

छत्तीसगढ़ को देश में 'धान का कटोरा' कहा जाता है। यहां की लोक-संस्कृति, रीति-रिवाजों और लोकगीतों का बहुत बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर कृषि, ग्रामीण जीवन और प्रकृति से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यहां मनाए जाने वाले त्योहारों में मिट्टी की सोंधी महक और फसलों की हरियाली का उत्सव साफ दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ विनय पाठक ने इस लोकपर्व के संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। उन्होंने बताया कि भारत मूल रूप से एक कृषि प्रधान देश है और यहां की एक बहुत बड़ी आबादी का जीवन पूरी तरह से खेती-किसानी और लोक-संस्कृति पर आधारित रहा है। चूंकि छत्तीसगढ़ में कृषि को जीवन का आधार माना जाता है, इसलिए यहां खेती से जुड़े पर्वों को एक अलग ही स्थान और सम्मान मिलता है। साल की शुरुआत में मनाए जाने वाले हरेली पर्व से लेकर बहुला चौथ और फिर कमरछठ तक, इन सभी त्योहारों में कृषि कार्य, पशुपालन और खेती में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया जाता है।

भगवान बलराम और हलधर की आराधना का पर्व

कमरछठ के इस पावन पर्व को छत्तीसगढ़ी समाज में हलछठ या हलषष्ठी के रूप में भी पूजा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह त्योहार भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम को समर्पित है, जिन्हें प्यार से लोग हलधर भी कहते हैं। बलराम जी का मुख्य अस्त्र हल था, और किसान के जीवन में हल की क्या भूमिका है, इसे शब्दों में बयां करने की आवश्यकता नहीं है। हल ही वह जरिया है जिससे धरती का सीना चीरकर अन्न उगाया जाता है। इसी वजह से हल और कृषक जीवन से जुड़े इस पर्व का छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने में एक बेहद विशिष्ट स्थान है। इसके साथ ही, इस दिन षष्ठी देवी यानी छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है। हिंदू धर्म में षष्ठी देवी को बच्चों की रक्षक और उन्हें दीर्घायु का आशीर्वाद देने वाली देवी के रूप में मान्यता प्राप्त है।

संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए कठिन व्रत

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व में माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उनके बेहतर स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ बेहद कठिन व्रत रखती हैं। हालांकि, इस तरह के व्रत की परंपरा उत्तर भारत के कई अन्य राज्यों में भी देखी जाती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसे मनाने का तरीका बेहद अनूठा और वहां की आंचलिक लोक-परंपराओं से सराबोर होता है। यहां की महिलाएं इस व्रत को बहुत कड़े नियमों के साथ पूरा करती हैं, जिसमें पारंपरिक व्यंजनों और स्थानीय वनस्पतियों का विशेष महत्व होता है।

ग्वालन की पारंपरिक लोककथा और सत्य का महत्व

कमरछठ के इस पर्व के दौरान माताएं एक विशेष कथा भी सुनती हैं, जिसका धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। इस पर्व से जुड़ी कई लोककथाएं ग्रामीण अंचलों में प्रचलित हैं। डॉ विनय पाठक के अनुसार, इनमें से सबसे लोकप्रिय कथा एक ग्वालन से संबंधित है, जो दूध और दही बेचकर अपना गुजारा करती थी। कथा के अनुसार, एक बार सत्य और असत्य की उलझन के कारण और अपने आचरण के चलते उसके बच्चे की मृत्यु हो गई थी। इस भीषण विपदा के बाद, जब ग्वालन को अपनी भूल का अहसास हुआ, तो उसने सच्चे मन से अपनी गलती का प्रायश्चित किया। उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप को देखकर छठी देवी अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने कृपा करके उसके मृत बच्चे को दोबारा जीवित कर दिया। यह लोककथा सदियों से समाज को यह संदेश देती आ रही है कि जीवन में हमेशा सत्य की राह पर चलना चाहिए और अपने कर्मों के प्रति ईमानदार रहना चाहिए।

कमरछठ व्रत से जुड़े प्रमुख रीति-रिवाज और धार्मिक रस्में

इस पर्व को मनाने के लिए महिलाएं कई तरह की प्राचीन और पारंपरिक रस्मों का पालन करती हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:

  • महुआ के दातून से सुबह की शुरुआत: कमरछठ के दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह सवेरे उठकर महुआ की टहनी से बने दातून का इस्तेमाल करके अपने दांत साफ करती हैं। यह रस्म स्थानीय वनस्पतियों के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।
  • पारंपरिक 'सगरी' का निर्माण: महिलाएं आपस में मिलकर धरती पर एक छोटा सा कृत्रिम तालाब बनाती हैं जिसे 'सगरी' कहा जाता है। इस गड्ढे में जल भरा जाता है और इसके चारों ओर बेर, पलाश (परसा) और कांस के फूल तथा अन्य पौधों को रोपा जाता है।
  • सगरी और पौधों का सामूहिक पूजन: सगरी तैयार करने के बाद महिलाएं उसकी और उसके आसपास लगाए गए सभी पौधों की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चन करती हैं। यह रस्म जल और वनस्पति के संरक्षण का संदेश देती है।
  • पीठ पर 'पुतका' लगाने की रस्म: पूजा संपन्न होने के बाद माताएं सफेद रंग की मिट्टी (जिसे 'छुई' कहा जाता है) को गीले सूती कपड़े में लपेटकर अपने बच्चों की पीठ पर थपथपाकर एक गोल निशान यानी 'पुतका' बनाती हैं। यह बच्चों की लंबी आयु और तंदुरुस्ती की कामना के लिए किया जाता है।

सगरी के पानी से मौसम और जलस्तर का आकलन

ग्रामीण क्षेत्रों में सगरी के पानी को लेकर एक बेहद प्राचीन लोक-मान्यता भी जुड़ी हुई है। ऐसा माना जाता है कि सगरी में भरा हुआ पानी आने वाले दिनों के मौसम और भूजल स्तर का संकेत देता है। यदि पूजा के पूरे दिनभर सगरी में पानी का स्तर पर्याप्त मात्रा में बना रहता है, तो ग्रामीण इसे एक शुभ संकेत मानते हैं। इसका अर्थ यह निकाला जाता है कि क्षेत्र का जलस्तर मजबूत रहेगा और फसलों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध होगा। इसके विपरीत, यदि सगरी का पानी तेजी से सूख जाता है या कम हो जाता है, तो लोग इसे आने वाले समय में संभावित जल संकट और खेती पर पड़ने वाले उसके बुरे प्रभाव के रूप में देखते हैं। इस तरह यह पर्व मौसम के पूर्वानुमान का भी एक जरिया रहा है।

पर्यावरण संरक्षण की गहरी वैज्ञानिक सोच

कमरछठ को केवल एक साधारण धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखना भूल होगी। इस त्योहार के पीछे की सोच पूरी तरह से वैज्ञानिक और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने वाली है। सगरी के रूप में छोटे जलस्रोतों का निर्माण करना, जल का संग्रहण करना और उसके आसपास विभिन्न औषधीय पौधों को लगाकर उनकी पूजा करना यह संदेश देता है कि मानव जीवन की उत्तरजीविता जल और जंगल पर ही टिकी हुई है। डॉ विनय पाठक भी इस बात पर जोर देते हैं कि छत्तीसगढ़ के इन पारंपरिक त्योहारों का आध्यात्मिक पहलू तो मजबूत है ही, लेकिन इसके साथ ही इनमें बहुत गहरा सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी छिपा हुआ है जो प्रकृति के महत्व को समझाता है।

सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखता लोकपर्व

आज के आधुनिक युग में भी छत्तीसगढ़ की ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों की महिलाएं कमरछठ की इस प्राचीन परंपरा को पूरे नियम-कायदों और अगाध श्रद्धा के साथ मना रही हैं। यह त्योहार इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कैसे पुरानी पीढ़ियों की अच्छी सीख आज भी हमारे समाज में जिंदा है। मातृत्व का यह पावन पर्व छत्तीसगढ़ की लोक-परंपराओं, ग्रामीण संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता रहता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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