नामांकन रद्द होने के बाद भी मीनाक्षी नटराजन के पास बचे हैं ये 3 रास्ते, खुल सकती है राज्यसभा की राह मध्य प्रदेश 2 घंटे पहले 3
मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज होने से बीजेपी के महेश केवट की राह आसान हो गई है। पर जानकारों के मुताबिक तीन कानूनी विकल्प अब भी मीनाक्षी के लिए राज्यसभा का दरवाजा खोल सकते हैं।

मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर ऐसा अप्रत्याशित मोड़ आया है, जिसने राज्य के सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। जिस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही थी और हॉर्स ट्रेडिंग के डर से विधायकों को कर्नाटक तक पहुंचाया जा रहा था, अब उसी सीट से कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र ही निरस्त कर दिया गया है। रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा के इस फैसले को कांग्रेस ने लोकतंत्र की हत्या और पक्षपातपूर्ण कदम बताया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी इसे नियमों के अनुरूप पूरी तरह न्यायसंगत बता रही है।

तीन में से एक सीट पर फंसा पेच

मध्य प्रदेश से राज्यसभा की कुल तीन सीटों पर चुनाव होना तय था। संख्या बल के आधार पर इनमें से दो सीटें पहले ही भाजपा के खाते में जाती मानी जा रही थीं। तीसरी सीट पर ही कांटे की टक्कर की उम्मीद थी, जहां भाजपा ने मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को मैदान में उतारा था और सीधा मुकाबला महेश तथा मीनाक्षी के बीच था। लेकिन नामांकन निरस्त होने के बाद अब महेश केवट के निर्विरोध राज्यसभा पहुंचने का रास्ता लगभग साफ नजर आ रहा है।

क्यों खारिज हुआ नामांकन

पूरे विवाद की जड़ मीनाक्षी नटराजन के शपथ पत्र में दर्ज जानकारियों से जुड़ी है। भाजपा उम्मीदवार महेश केवट और प्रदेश महासचिव राहुल कोठारी ने रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया कि मीनाक्षी नटराजन ने तेलंगाना के हैदराबाद की एक अदालत में लंबित एक सिविल मामले की जानकारी अपने हलफनामे यानी फॉर्म 26 में पूरी तरह छिपा ली।

रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश के मुताबिक मीनाक्षी नटराजन को अक्टूबर 2025 में इस मामले से जुड़ा एक स्पष्टीकरण नोटिस मिला था, इसलिए उन्हें इसकी जानकारी थी और इसका उल्लेख न करना महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने की श्रेणी में आता है। इसके उलट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा का तर्क है कि यह न तो कोई आपराधिक मामला था और न ही पुलिस एफआईआर, बल्कि सिर्फ मुआवजे की कार्यवाही से जुड़ा एक साधारण कारण बताओ नोटिस था। इसलिए इसे हलफनामे में दर्ज करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं था।

नियमों में कहां है मीनाक्षी के हक की गुंजाइश

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव भगवानदेव इसराणी ने चुनाव आयोग के नियमों का हवाला देते हुए कई चौंकाने वाले तथ्य रखे हैं। उनके अनुसार रिटर्निंग ऑफिसर का नामांकन रद्द करने का यह फैसला पूरी तरह नियमों के अनुकूल नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने चुनाव आयोग की आधिकारिक हैंडबुक के आधार पर तीन बड़े कानूनी पेच गिनाए हैं, जो इस फैसले को कमजोर साबित करते हैं।

  • हैंडबुक के पॉइंट 10(xiii) के तहत यदि नामांकन में कोई त्रुटि मिलती है, तो उसे खारिज करने से पहले उम्मीदवार को अपनी गलती सुधारने के लिए कम से कम 24 घंटे का समय देना अनिवार्य है, जो मीनाक्षी को नहीं मिला।
  • हैंडबुक का पॉइंट 10(xii) साफ कहता है कि केवल अधूरी या विरोधाभासी जानकारी के आधार पर सीधे पर्चा रद्द नहीं किया जा सकता।
  • लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार कोई भी उम्मीदवार तब तक अयोग्य नहीं होता, जब तक किसी अदालत द्वारा उसे दोषी ठहराकर कम से कम दो साल की सजा न सुना दी जाए।

कांग्रेस के पास ये तीन बड़े विकल्प

अब कांग्रेस पार्टी के पास मुख्य रूप से तीन बड़े कानूनी रास्ते मौजूद हैं, जिन पर वह अपने वकीलों के साथ मंथन कर रही है।

  1. चुनाव आयोग में समीक्षा: पहले विकल्प के तौर पर कांग्रेस दिल्ली में चुनाव आयोग के समक्ष इस फैसले की समीक्षा की मांग कर सकती है और यह दलील दे सकती है कि यह महज एक निजी शिकायत थी, कोई एफआईआर नहीं।
  2. हाईकोर्ट में रिट याचिका: दूसरे और सबसे असरदार विकल्प के रूप में कांग्रेस जबलपुर या इंदौर हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच के सामने रिट याचिका दायर कर रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश को सीधे चुनौती दे सकती है। कानूनी जानकार इसे सबसे तेज और कारगर तरीका मान रहे हैं।
  3. इलेक्शन पिटीशन: तीसरे विकल्प के तहत चुनाव की पूरी प्रक्रिया समाप्त होने और नतीजे आने के बाद कांग्रेस इलेक्शन पिटीशन के जरिए परिणाम को चुनौती दे सकती है, हालांकि इस प्रक्रिया में काफी लंबा समय लगने की आशंका रहती है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मीनाक्षी नटराजन के लिए राज्यसभा के दरवाजे अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, लेकिन अब आगे की पूरी तस्वीर हाईकोर्ट के रुख पर ही टिकी हुई है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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