इंदौर में टायर का पंचर जोड़कर बनाया घर, भोपाल के वृद्धाश्रम में अकेले पिता ने तोड़ा दम, परिवार ने बनाई दूरी मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 2
एक पिता ने जीवन भर पसीना बहाकर अपने बच्चों का भविष्य संवारा और इंदौर में घर भी बनवाया, लेकिन अंतिम समय में वही बच्चे उन्हें बेसहारा छोड़ गए। मौत के बाद भी बच्चों ने उनकी सुध नहीं ली, जिसके चलते समाजसेवियों को उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा।

एक पिता का दर्दनाक अंत

भोपाल से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जिसने रिश्तों की मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। राजधानी भोपाल के अपना घर वृद्धाश्रम में रहने वाले एक बुजुर्ग की मौत के बाद उनके परिवार का जो रवैया सामने आया, वह किसी को भी झकझोर कर रख देने वाला है। यह कहानी सिर्फ एक पिता के देहांत की नहीं है, बल्कि उस समाज के आईने की है जहाँ बुढ़ापे में माता-पिता उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। घनश्याम राजपूत नाम के इस बुजुर्ग ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए समर्पित कर दी थी, लेकिन जीवन की आखिरी सांसे उन्होंने अपनों के बिना एक वृद्धाश्रम में लीं।

जीवन भर किया संघर्ष

घनश्याम राजपूत का पूरा जीवन कड़े संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने अपनी जीविका चलाने के लिए टायर-ट्यूब का पंचर बनाने जैसे कठिन काम किए। दिन-रात की मेहनत और खून-पसीने की कमाई से उन्होंने अपने चारों बच्चों को न केवल पाल-पोषकर बड़ा किया, बल्कि उन्हें पढ़ा-लिखाकर एक मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की। उनकी मेहनत रंग भी लाई और उन्होंने इंदौर में खुद का एक पक्का घर भी बनवाया। एक पिता की नजर में यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उनके बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो सकें और उनके पास रहने के लिए एक सुरक्षित छत हो। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, और जिस घर को उन्होंने अपने बच्चों के लिए बनवाया था, उसी घर से उन्हें बेदखल कर दिया गया।

वृद्धाश्रम में मिली अंतिम पनाह

एक ऐसा समय आया जब घनश्याम राजपूत अपने ही परिवार के लिए बोझ बन गए। उन्हें भोपाल में लावारिस और बेसहारा हालत में छोड़ दिया गया। उस कठिन दौर में कुछ दयालु युवाओं ने उनकी सुध ली और उन्हें अपना घर वृद्धाश्रम पहुँचाया। पिछले करीब एक साल से वे इसी वृद्धाश्रम में रह रहे थे। उनके पास अपने बच्चों की कोई सुध नहीं थी और न ही वे उनसे मिलने आते थे। बीते 4 अगस्त को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

मौत के बाद भी बच्चों की उपेक्षा

घनश्याम जी की मृत्यु के बाद वृद्धाश्रम प्रबंधन ने उनके बच्चों तक सूचना पहुँचाने का प्रयास किया। उनके पास बेटे का फोन नंबर मौजूद था। लेकिन, जब आश्रम की ओर से फोन लगाया गया और बेटे को पता चला कि फोन वृद्धाश्रम से है, तो उसने बिना कोई बात किए तुरंत फोन काट दिया। यह दिखाता है कि किस तरह रिश्तों में संवेदनाएं खत्म हो चुकी हैं। बेटे ने दोबारा कभी संपर्क नहीं किया और न ही पिता का हाल जानने की जहमत उठाई। वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा इस पूरे घटनाक्रम से बेहद आहत हैं। उनका कहना है कि यह एक ऐसी स्थिति है जो किसी को भी भावुक कर सकती है।

दो दिन तक चला इंतजार

वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और समाजसेवियों ने यह उम्मीद नहीं छोड़ी थी कि शायद कोई तो अंतिम विदाई के लिए आएगा। घनश्याम जी के पार्थिव शरीर को दो दिनों तक इंतजार में रखा गया, लेकिन कोई भी परिजन वहाँ नहीं पहुँचा। जब यह साफ हो गया कि परिवार का कोई सदस्य पिता के अंतिम दर्शन के लिए भी आने को तैयार नहीं है, तब समाजसेवियों ने आगे आकर उनका अंतिम संस्कार किया। वे लोग जो खून के रिश्ते से जुड़े भी नहीं थे, उन्होंने ही एक पिता को आखिरी विदाई दी।

समाज के लिए बड़ा सवाल

यह दुखद अध्याय आज हमारे सामने कई बड़े सवाल छोड़ गया है। क्या माता-पिता का त्याग केवल संपत्ति के बंटवारे तक सीमित रह गया है? क्या उम्र के उस पड़ाव पर जहाँ माता-पिता को केवल बच्चों के स्नेह और सहारे की जरूरत होती है, उन्हें घर से निकालकर वृद्धाश्रम में धकेलना ही आज की पीढ़ी का संस्कार बन गया है? घनश्याम राजपूत जैसे कितने ही बुजुर्ग आज इस दर्द को झेलने के लिए मजबूर हैं। यह घटना समाज के उन सभी लोगों के लिए एक चेतावनी है जो अपने माता-पिता को बोझ समझने की भूल करते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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