मध्य प्रदेश में न्यायिक बदलाव: अब मोबाइल आपके पास, कोर्ट रखेगा डिजिटल साक्ष्य की कॉपी मध्य प्रदेश 3 महीने पहले 124
मध्य प्रदेश सरकार ने ई-साक्ष्य प्रणाली लागू कर दी है, जिससे अदालतों में अब डिजिटल सबूत बिना किसी अतिरिक्त सर्टिफिकेट के मान्य होंगे। इस नई व्यवस्था से पुलिस जांच में तेजी आएगी और गवाहों के मोबाइल या गैजेट जब्त नहीं किए जाएंगे।

मध्य प्रदेश की अदालतों में डिजिटल क्रांति

मध्य प्रदेश की न्याय व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और बड़े बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। राज्य सरकार ने अदालती कार्यवाही को पूरी तरह से हाईटेक बनाने के उद्देश्य से ई-साक्ष्य प्रणाली को आधिकारिक रूप से लागू कर दिया है। इस बदलाव के तहत, राज्य के गृह विभाग ने मध्य प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स नियम 2026 का गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है। अब अदालतों में फोटो, वीडियो और ऑडियो जैसे डिजिटल सबूतों को स्वीकार करने के लिए किसी भी लंबी कानूनी प्रक्रिया या अतिरिक्त सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं होगी। यह कदम भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 को धरातल पर उतारने की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव माना जा रहा है।

ई-साक्ष्य ऐप की भूमिका और कार्यप्रणाली

इस पूरी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर यानी NIC ने एक विशेष ई-साक्ष्य ऐप तैयार किया है। यह पोर्टल इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम यानी ICJS के माध्यम से काम करेगा। राज्य सरकार ने इस प्रणाली को अंतिम रूप देने से पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के साथ गहन परामर्श किया है। यह नई व्यवस्था प्रदेश की सभी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट और अधीनस्थ न्यायालयों में समान रूप से लागू की जाएगी। इस ऐप के जरिए पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर ही वास्तविक समय में गवाहों के बयान रिकॉर्ड कर सकेंगे और डिजिटल सबूतों को सुरक्षित सर्वर पर अपलोड कर पाएंगे।

65बी सर्टिफिकेट की लंबी प्रक्रिया से मिली मुक्ति

अब तक की मौजूदा व्यवस्था में किसी भी डिजिटल सबूत, जैसे कि फोटो या वीडियो, को अदालत में मान्य कराने के लिए 65बी सर्टिफिकेट हासिल करना एक बेहद लंबी और थकाऊ कानूनी प्रक्रिया थी। इसके बिना कोर्ट डिजिटल साक्ष्यों को स्वीकार करने से इनकार कर देती थी। नई प्रणाली के आने के बाद, ई-साक्ष्य ऐप के जरिए प्राप्त किए गए रिकॉर्ड सीधे तौर पर कानूनी साक्ष्य माने जाएंगे। चूँकि यह ऐप पूरी तरह से सरकारी सर्वर से जुड़ा हुआ है, इसलिए अलग से प्रमाण पत्र तैयार करने की आवश्यकता पूरी तरह खत्म हो गई है।

डिजिटल छेड़छाड़ पर लगाम

पुराने समय में डिजिटल सबूतों को पेनड्राइव या सीडी के माध्यम से मालखाने में जमा किया जाता था। बचाव पक्ष के वकील अक्सर कोर्ट में यह दलील देते थे कि सबूत की 'चेन ऑफ कस्टडी' टूट गई है या वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है। लेकिन अब नई प्रणाली में वीडियो रिकॉर्ड होते ही उसका एक यूनिक डिजिटल फिंगरप्रिंट तैयार हो जाएगा। यदि फाइल में एक सेकंड के लिए भी कोई संपादन किया गया, तो उसका डिजिटल लॉक तुरंत टूट जाएगा और धोखाधड़ी की मंशा पकड़ी जाएगी।

समय की बचत और लाइव मॉनिटरिंग

पहले की व्यवस्था में पुलिस, फोरेंसिक लैब और अदालतों के बीच फाइलों की आवाजाही में महीनों का समय बर्बाद होता था, जिसके कारण मुकदमों के फैसले वर्षों तक लंबित रहते थे। अब ICJS पोर्टल से जुड़े होने के कारण, पुलिस द्वारा अपलोड किया गया कोई भी सबूत जज और फोरेंसिक एक्सपर्ट के पास एक क्लिक पर उपलब्ध होगा। इससे न्याय प्रक्रिया में अनावश्यक देरी को रोकने में बड़ी मदद मिलेगी और मुकदमों का निपटारा तेजी से हो सकेगा।

गैजेट्स की जब्ती से मिलेगी राहत

अक्सर देखा गया है कि डिजिटल सबूतों की सत्यता की जांच करने के लिए अदालतें महीनों या सालों तक पीड़ितों और गवाहों के मूल मोबाइल उपकरण या हार्ड डिस्क को मालखाने में जब्त रखती थीं। अब इस नियम के तहत, कोर्ट केवल डेटा की प्रमाणित डिजिटल कॉपी ही अपने सुरक्षित सर्वर पर रखेगी। इसके बाद मोबाइल या अन्य संबंधित उपकरण तुरंत उनके मालिकों को लौटा दिए जाएंगे, जिससे आम नागरिकों को होने वाली असुविधा कम होगी।

ई-साक्ष्य प्रणाली के तीन कड़े नियम

इस पूरी व्यवस्था की गोपनीयता और अखंडता बनाए रखने के लिए सरकार ने तीन सख्त निर्देश जारी किए हैं:

  • यौन अपराधों से प्रभावित किसी भी महिला या नाबालिग की पहचान को उजागर करने वाले इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स को पोर्टल पर सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं होगी।
  • इस पोर्टल पर दस्तावेज देखने या अपलोड करने का अधिकार केवल मामले से संबंधित पक्षों या विशेष अनुमति प्राप्त अधिकारियों को ही होगा। कोई भी बाहरी व्यक्ति इसका उपयोग नहीं कर पाएगा।
  • यदि कोई वकील, केस से जुड़ा सरकारी अफसर या अन्य व्यक्ति पोर्टल पर जानबूझकर कोई गलत या अप्रासंगिक डेटा अपलोड करता है, तो उस पर भारी दंडात्मक जुर्माना लगाया जाएगा।
अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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