राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
राजस्थान में जनप्रतिनिधि और नौकरशाही के बीच टकराव में एक बार फिर जनप्रतिनिधि का पलड़ा भारी रहा और एक अधिकारी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। ताजा मामला पूर्वी राजस्थान के भरतपुर जिले की बयाना नगरपालिका से जुड़ा है। यहां निर्दलीय विधायक ऋतु बनावत और नगरपालिका अधिशासी अधिकारी (EO) अनीता कुशवाह के बीच हुए विवाद का असर उसी दिन सामने आ गया। EO अनीता कुशवाह को निलंबित कर दिया गया और अब उनका मुख्यालय DLB जयपुर कर दिया गया है।
यह प्रकरण दो दिन से सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। विधायक और EO की बैठक के दौरान हुई बहस सार्वजनिक हो गई, मगर इसकी सजा केवल EO अनीता कुशवाह को मिली। असल में गलती किसकी थी, यह अब तक पर्दे के पीछे है। फिर भी यह संदेश देना जरूरी समझा गया कि जनप्रतिनिधि का रौब बना रहे, इसलिए कर्मचारी और अधिकारी पर दबाव बनाया गया।
ऋतु बनावत का राजनीतिक पृष्ठभूमि
ऋतु बनावत भले ही निर्दलीय विधायक चुनी गई हों, लेकिन वे पहले बीजेपी से जुड़ी रही हैं। पहली बार विधायक बनीं ऋतु बनावत हाल ही में एक अखबार की ओर से विधायक कोष में ‘कट मनी’ को लेकर किए गए ‘स्टिंग ऑपरेशन’ में फंस चुकी हैं। इसके बाद सरकार ने उनके विधायक कोष का खाता फ्रीज कर दिया था।
बनावत के पति ऋषि बंसल भरतपुर बीजेपी के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। पिछली बार ऋतु बनावत ने बीजेपी से टिकट मांगा था, लेकिन नहीं मिलने पर वे निर्दलीय मैदान में उतरीं और जीत दर्ज की। विधायक से उलझने वाली EO अनीता कुशवाह भी उनके ही विधानसभा क्षेत्र की हैं। शुक्रवार को बयाना नगरपालिका कार्यालय में हुए इस विवाद की जड़ में करोड़ों रुपये का एक टेंडर बताया जा रहा है।
अफसरों की चुप्पी की वजह
राजस्थान में अधिकारी और जनप्रतिनिधि के बीच टकराव का यह कोई पहला मामला नहीं है। कैमरे के सामने और कैमरे के पीछे ऐसे कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। ये भिड़ंतें प्रधान से लेकर मंत्री तक और बाबू से लेकर शासन सचिव तक से जुड़ी रही हैं, मगर जीत हर बार जनप्रतिनिधियों की ही होती है, भले गलती उनकी रही हो। यह अब एक चलन बन चुका है।
इसी चलन से बचने के लिए सरकारी कर्मचारी और बड़े अधिकारी जनप्रतिनिधियों के सामने चुप्पी साध लेते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि गाज उन्हीं पर गिरेगी, चाहे उनकी गलती हो या न हो। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या बीजेपी की, दोनों का रवैया एक जैसा रहता है। असली मुद्दे से ध्यान हटाते हुए अधिकारी या कर्मचारी को प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर या तो वहां से हटा दिया जाता है या तबादला कर दिया जाता है।
तबादला सूचियों की हकीकत
बीजेपी और कांग्रेस दोनों के शासन में आईएएस और आईपीएस समेत ऊपर से नीचे तक के अधिकारियों की तबादला सूचियों में कई ऐसे नाम होते हैं, जिनकी अपने इलाकों में जनप्रतिनिधियों से नहीं बनती। इन सूचियों का विश्लेषण किया जाए तो बहुत से अधिकारी जनप्रतिनिधियों के ‘गुस्से’ और ‘धौंस’ का शिकार होते हैं। अधिकारियों और कर्मचारियों को डराना, बात-बात पर ‘नौकर’ होने का अहसास कराने की धमकी देना या सार्वजनिक रूप से खरी-खोटी सुनाकर अपना रसूख दिखाना जनप्रतिनिधियों का ‘शगल’ बन गया है।
सजा का रूप: तबादला या निलंबन
कई मंत्रियों की अपने विभाग के शासन सचिवों यानी वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों तक से नहीं बनती, और इसका नतीजा उन्हें तत्काल तबादले के रूप में भुगतना पड़ता है। सियासी गलियारों और सचिवालय में इन चर्चाओं का दौर अक्सर चलता रहता है, मगर नौकरशाह इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप सह लेता है। वह यही सोचकर शांत बैठ जाता है कि ‘नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर कौन ले’, और इसी का फायदा उठाया जाता है।
एक ‘रेयर केस’
हालांकि राजस्थान में अपवाद स्वरूप हाल ही में ऐसे एक मामले में राज्य के सहकारिता मंत्री गौतम दक के खिलाफ केस दर्ज हुआ है। दक का एक ऑडियो भी वायरल हुआ था, जिसे चित्तौड़गढ़ के डूंगला थाने का बताया जा रहा है। इसमें वे स्थानीय थानाप्रभारी और स्टाफ के साथ गाली-गलौच कर धमका रहे थे। मंत्री ने इसका खंडन करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित बताया, लेकिन ऑडियो वायरल होते ही एसपी मौके पर पहुंचे और कार्रवाई के आदेश दिए। इसके बाद स्थानीय थानाधिकारी की ओर से मंत्री के खिलाफ राजकार्य में बाधा का मामला दर्ज कराया गया। मगर ऐसा बहुत कम, बल्कि ‘रेयर’ ही होता है।
बड़े हादसों में भी निशाने पर अधिकारी
यह सिर्फ जनप्रतिनिधियों और नौकरशाही के टकराव तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़ी घटनाओं और हादसों में भी गाज स्थानीय पुलिस और प्रशासन पर ही गिरती है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में जयपुर की पटाखा फैक्ट्री में हुआ ब्लास्ट है। इस हादसे में आठ लोग जिंदा जल गए थे और नीचे से ऊपर तक हड़कंप मच गया था, लेकिन कार्रवाई केवल थानाप्रभारी समेत नौ पुलिसकर्मियों पर हुई और उन्हें निलंबित कर दिया गया।
सवाल यह उठता है कि क्या अवैध काम केवल पुलिस-प्रशासन की शह से होते हैं? क्या अवैध कारोबार करने वालों को कोई राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलता? बिना राजनीतिक संरक्षण के पुलिस-प्रशासन भी ऐसे लोगों को सुरक्षा नहीं देता और वह भी हवा का रुख देखकर ही काम करता है।
ईमानदार अधिकारियों का टूटता मनोबल
हालांकि पुलिस और प्रशासन भी ‘दूध के धुले’ नहीं हैं और वे भी बराबर के भागीदार होते हैं, फिर भी सजा का पलड़ा हमेशा उन्हीं की ओर झुका रहता है। यह ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों के मनोबल को तोड़ता है, जबकि ऐसे मामलों में जरूरत संवेदनशीलता और न्याय की होती है। सजा जरूर मिले, लेकिन उसी को मिले जिसकी असल में गलती हो—फिर चाहे वह नौकरशाह हो या जनप्रतिनिधि।
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