पौड़ी गढ़वाल की पहाड़ियों का वो रहस्यमयी किला, जहां से हारकर भागने पर मजबूर हुए थे गोरखा धर्म 2 घंटे पहले 4
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल स्थित भैरव गढ़ी मंदिर का इतिहास बेहद रोमांचक है, जहां 1791 के युद्ध में गोरखा सेना को 28 दिनों में ही हार झेलनी पड़ी थी।

भैरव गढ़ी का ऐतिहासिक महत्व

उत्तराखंड की संस्कृति में मंदिरों और ऐतिहासिक किलो का विशेष स्थान है। इन्हीं में से एक पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में स्थित भैरव गढ़ी मंदिर है। यह स्थल न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि इसका संबंध गढ़वाल के प्राचीन राजाओं और उनके गौरवशाली इतिहास से है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, भगवान भैरव को संपूर्ण गढ़वाल क्षेत्र का रक्षक माना जाता है। इस स्थान की महिमा ऐसी है कि यहां पहुंचने वाले भक्तों की मुरादें पूरी होती हैं और वे कष्टों से मुक्त होते हैं।

लंगूर गढ़ की रहस्यमयी गाथा

भैरव गढ़ी मंदिर को गढ़वाल के उन प्रसिद्ध 52 गढ़ों या किलो में गिना जाता है, जिन्हें लंगूर गढ़ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 2,400 मीटर यानी करीब 9,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। पहाड़ों की चोटी पर स्थित होने के कारण यहां से आसपास का दृश्य अत्यंत मनमोहक दिखता है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस मंदिर के दर्शन मात्र से ही जीवन की नकारात्मकताएं और बुरी दृष्टि दूर हो जाती है। यहां का वातावरण श्रद्धालुओं को एक अनोखी शांति का अनुभव कराता है।

गोरखा आक्रमण और चमत्कारिक विजय

इतिहास के पन्नों को पलटें तो 18वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों, विशेषकर 1791 के आसपास, नेपाल से आए गोरखाओं ने गढ़वाल और कुमाऊं पर आक्रमण किया था। उस समय लंगूर गढ़ सामरिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण था। गोरखा सेना ने इस किले पर कब्जा करने के लिए लगातार दो वर्षों तक घेराबंदी जारी रखी। लेकिन, जब निर्णायक युद्ध शुरू हुआ, तो गोरखा सेना को मात्र 28 दिनों के भीतर ही मुंह की खानी पड़ी और वे थर-थर कांपते हुए वहां से भाग खड़े हुए। स्थानीय लोगों का दृढ़ विश्वास है कि यह जीत केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि कालभैरव की अदृश्य शक्ति के प्रभाव के कारण संभव हुई थी।

40 किलो का ताम्र-पत्र और रक्षक की उपाधि

इस युद्ध में कालभैरव के चमत्कार को देखकर गोरखा सेना का एक अधिकारी, जिसका नाम थापा था, नतमस्तक हो गया। भैरवनाथ की अलौकिक शक्ति से प्रभावित होकर उसने मंदिर में 40 किलो वजन का एक ताम्र-पत्र भेंट किया। तभी से इस पवित्र स्थल को गढ़वाल के रक्षक के रूप में विशेष पहचान मिली। आज भी मंदिर के आसपास खड़े होने पर हिमालय की गगनचुंबी चोटियां और बांझ, बुरांश तथा देवदार के घने जंगल दिखाई देते हैं, जो 360-डिग्री का एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

रोट का प्रसाद और धार्मिक मान्यताएं

भैरव गढ़ी में भगवान कालनाथ भैरव की पूजा की विधि भी निराली है। ऐसी मान्यता है कि उन्हें काली वस्तुएं प्रिय हैं। इसी कारण यहां मंडुए यानी रागी के आटे से बनी विशेष रोटी, जिसे रोट कहा जाता है, प्रसाद के रूप में अर्पित की जाती है। मंदिर में धार्मिक आयोजनों की बात करें तो हर साल ज्येष्ठ मास यानी जून के महीने में यहां एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें सम्मिलित होने के लिए श्रद्धालु दूर-दराज के क्षेत्रों से आते हैं। इसके अलावा, सावन के पवित्र महीने में भी मंदिर परिसर में विशेष कीर्तन और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। यदि आप यहां पहुंचना चाहते हैं, तो आपको लगभग 2 से 4 किलोमीटर की कठिन लेकिन रोमांचक चढ़ाई पूरी करनी पड़ती है, जो अपने आप में एक अलग अनुभव है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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