बस्तर में किसान की मेहनत रंग लाई: मात्र आधे एकड़ में लौकी की खेती से 3 लाख रुपये कमाने का लक्ष्य छत्तीसगढ़ एक महीने पहले 75
छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक प्रगतिशील किसान ने वैज्ञानिक तरीके से लौकी की खेती कर बंपर मुनाफे की मिसाल पेश की है। महज एक लाख रुपये के निवेश से उन्होंने तीन लाख रुपये की कमाई की योजना बनाई है।

बस्तर के किसान का कृषि में अनूठा प्रयोग

बस्तर अंचल में मानसून की दस्तक के साथ ही कृषि कार्य जोर पकड़ लेते हैं। इस दौरान स्थानीय किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने में जुट गए हैं। बस्तर के एक किसान ने लौकी की खेती को कमाई का जरिया बनाते हुए यह साबित कर दिया है कि अगर सही तकनीक और सही योजना के साथ काम किया जाए, तो छोटी जोत वाली जमीन से भी शानदार मुनाफा कमाया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि लौकी की फसल में अन्य सब्जियों की तुलना में बीमारियां कम होती हैं, जिससे जोखिम कम हो जाता है।

समलू कश्यप की सफलता की प्रेरणादायक कहानी

बस्तर के प्रगतिशील किसान समलू कश्यप पिछले 10 वर्षों से लगातार सब्जी उत्पादन में सक्रिय हैं। इस बार उन्होंने अपने प्रयोग के लिए आधे एकड़ जमीन का चयन किया है। समलू कश्यप ने इस फसल पर लगभग एक लाख रुपये की कुल लागत लगाई है। उनके अनुमान और फसल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, उन्हें इस बार तीन लाख रुपये तक की कुल आमदनी होने की पूरी उम्मीद है। यदि उनकी यह योजना सफल रहती है, तो सभी खर्चों को काटने के बाद उन्हें दो लाख रुपये का सीधा शुद्ध मुनाफा प्राप्त होगा, जो कि खेती के व्यवसाय में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

वैज्ञानिक तरीके और बेड विधि का कमाल

इस सफलता के पीछे किसान द्वारा अपनाई गई विशेष तकनीकी विधि है। समलू कश्यप ने अपनी खेती के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि उन्होंने परंपरागत तरीके से हटकर खेती की तैयारी की:

  • सबसे पहले खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई की गई ताकि मिट्टी की गुणवत्ता सुधरे।
  • रोटावेटर के इस्तेमाल से मिट्टी को पूरी तरह से भुरभुरा बनाया गया।
  • खेती के लिए उन्होंने वैज्ञानिक 'बेड विधि' (Bed Method) को चुना, जो पौधों के विकास के लिए काफी फायदेमंद है।
  • इस विधि में बेड से बेड की दूरी चार फीट निर्धारित की गई है।
  • पौधों के बीच की दूरी भी चार फीट रखी गई है, जिससे पौधों को पर्याप्त हवा और धूप मिल सके।
  • खाद के रूप में उन्होंने जैविक गोबर खाद और DAP का संतुलित और सही मात्रा में प्रयोग सुनिश्चित किया है।

किसान के अनुसार, यह बेड विधि सामान्य तौर पर की जाने वाली खेती की तुलना में काफी बेहतर परिणाम दे रही है और इसमें पैदावार की क्षमता अधिक देखी जा रही है।

लागत, रखरखाव और बाजार की स्थिति

लौकी की खेती में जुताई से लेकर अंतिम तुड़ाई तक की प्रक्रिया में कुल एक लाख रुपये का खर्च आता है। फसल को फफूंद और अन्य रोगों से बचाने के लिए वे समय-समय पर फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव भी कर रहे हैं। वर्तमान बाजार की स्थिति की बात करें तो लौकी की मांग काफी अच्छी है। बाजार में इसके दाम दस रुपये से लेकर बीस रुपये प्रति किलो तक मिल रहे हैं, जो किसानों के लिए काफी उत्साहजनक है। मानसून के दौरान बस्तर में इस तरह की खेती छोटे किसानों के लिए आय का एक मजबूत माध्यम बनकर उभर रही है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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