छत्तीसगढ़ के कुम्हली गांव के मूर्तिकार धनीराम साहू का कमाल, बलवा लाल पत्थरों से तराशी प्रतिमाओं की दूसरे राज्यों में बढ़ी मांग छत्तीसगढ़ 2 घंटे पहले 6
छत्तीसगढ़ के मूर्तिकार धनीराम साहू पिछले 25 वर्षों से पत्थरों को तराशकर आकर्षक मूर्तियां बना रहे हैं। शुरुआती दिक्कतों से उबरकर अब उनकी बनाई मूर्तियों की मांग अन्य राज्यों में भी होने लगी है।

पत्थरों को तराशकर आकार देने का अनोखा हुनर

बेजान और कठोर पत्थरों में अपनी कला से जान फूंक देना बेहद कठिन काम माना जाता है। इस पारंपरिक कला के लिए असीम धैर्य, लगातार मेहनत और बेहतरीन हुनर की आवश्यकता होती है। छत्तीसगढ़ के कुम्हली गांव के रहने वाले मूर्तिकार धनीराम साहू ने अपनी लगन और दिन-रात के कड़े परिश्रम से साधारण पत्थरों को एक नई पहचान दी है। उनकी उंगलियों के तराशे पत्थरों की गूंज अब सिर्फ उनके गृह राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी उनकी मूर्तियों की काफी मांग देखी जा रही है।

बिलासपुर के गांवों से आते हैं खास बलवा लाल पत्थर

धनीराम साहू आकर्षक और बारीक कलाकृतियों वाली प्रतिमाएं तैयार करने के लिए खास तौर पर बलवा लाल पत्थरों और विशाल चट्टानों का उपयोग करते हैं। वे इन पत्थरों को बिलासपुर के आसपास के गांवों से मंगवाते हैं। इसके बाद अपनी कार्यशाला में वे इन पत्थरों पर छेनी और हथौड़ी चलाकर कई धार्मिक और सुंदर आकृतियों में ढाल देते हैं। उनकी बनाई प्रमुख मूर्तियों में शामिल हैं:

  • भगवान हनुमान की भव्य मूर्तियां
  • धार्मिक अनुष्ठानों के लिए निर्मित शिवलिंग
  • मां दुर्गा देवी की आकर्षक प्रतिमाएं
  • सजावटी और पारंपरिक महत्व वाले शेर और हाथी

1999 में शुरू हुआ था कला का कठिन सफर

अपनी इस कला यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए मूर्तिकार धनीराम साहू बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1999 में मूर्तिकला सीखने की शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक, यानी 25 साल से ज्यादा के लंबे सफर में वे लगातार इस काम में पूरी निष्ठा के साथ जुटे हुए हैं। हालांकि, शुरुआत का दौर उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं रहा। शुरुआती दिनों में उन्हें मूर्तियां तैयार करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

उस समय उनके काम में उतनी कुशलता नहीं थी और बाज़ार में उनकी मूर्तियों की मांग भी कम रहती थी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी कला को निखारने का प्रयास लगातार जारी रखा। अपनी लगन के बल पर उन्होंने मूर्तिकला के हर पहलू को सीखा। पिछले छह वर्षों में उनके काम को एक नई पहचान मिली है और अब उनकी प्रतिमाओं की मांग में काफी तेजी आई है।

आकार के हिसाब से तय होती हैं प्रतिमाओं की कीमतें

धनीराम साहू द्वारा निर्मित मूर्तियों की दरें उनके आकार और उन पर की गई बारीक नक्काशी के आधार पर तय की जाती हैं। उनकी कलाकृतियां विभिन्न कीमतों में उपलब्ध हैं:

  • 1 फीट की सबसे छोटी मूर्ति की शुरुआती कीमत करीब 900 रुपये है।
  • 2 फीट की मूर्ति कम से कम 10 हजार रुपये में बिकती है।
  • 3 फीट ऊंची मूर्ति लगभग 19 हजार रुपये तक में उपलब्ध कराई जाती है।
  • उनके पूरे कला सफर में तैयार की गई सबसे बड़ी मूर्ति साढ़े पांच फीट की रही है, जिसे उन्होंने 65 हजार रुपये में बेचा है।

पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने की बड़ी चुनौती

पत्थर की मूर्ति तैयार करने का काम बेहद कठिन और वक्त लेने वाला होता है। धनीराम साहू का कहना है कि पत्थरों को मनचाहा रूप देने के लिए दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है। इस काम में समय और धैर्य दोनों की भारी जरूरत होती है, साथ ही कई तरह की व्यावहारिक कठिनाइयां भी आती हैं।

इसके अलावा वे एक बड़ी चिंता भी साझा करते हैं। उनका मानना है कि आज की युवा पीढ़ी इस तरह की पारंपरिक और कड़े परिश्रम वाली मूर्तिकला को सीखने में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रही है। युवाओं की कम दिलचस्पी के कारण इस ऐतिहासिक हुनर को आगे बढ़ाना और बचाए रखना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, धनीराम साहू अपनी मेहनत से पत्थरों को तराशकर उन्हें खूबसूरत रूप देने का काम निरंतर कर रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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