Ground Report: नल जल योजना बेअसर, झिरिया के भरोसे बुझ रही ग्रामीणों की प्यास मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 2
बालाघाट के घंघरिया गांव में जल जीवन मिशन की नल जल योजना बार-बार खराब होने से ग्रामीण मनकुंवर नदी में गड्ढा खोदकर बनाई झिरिया से पानी भरने को मजबूर हैं। नदी से रेत खत्म होने और भू-जल स्तर गिरने से संकट और गहरा गया है।

गर्मी अपने चरम पर है और मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पानी की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। सरकार जिन योजनाओं के सहारे अपनी पीठ थपथपाती है, उन्हीं की जमीनी हकीकत दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। कागजों पर भले ही सब दुरुस्त दिखे, मगर धरातल पर मुसीबत जस की तस खड़ी रहती है। ऐसा ही नजारा बालाघाट जिले के चांगोटोला क्षेत्र के घंघरिया गांव का है, जहां लोग नदी में गड्ढा खोदकर पानी पीने को विवश हैं।

योजना तो शुरू हुई, पर राहत नहीं मिली

घंघरिया गांव में जल जीवन मिशन के तहत नल जल योजना शुरू तो हुई, लेकिन उसका हाल यह है कि सप्ताह में एक बार कहीं न कहीं दिक्कत आ ही जाती है। कभी पंप खराब हो जाता है तो कभी पाइप फट जाता है। ऐसे हालात में ग्रामीणों ने अपने लिए खुद ही रास्ता निकाल लिया है। गांव के पास बहने वाली मनकुंवर नदी में लोगों ने खुद गहरा गड्ढा खोदकर झिरिया तैयार कर ली है। इसी झिरिया से रिसने वाले पानी को भरकर लोग अपने घर ले जाते हैं।

सुबह से शाम तक इस झिरिया पर महिलाओं और बच्चों की भीड़ जुटी रहती है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार नलों में कई-कई दिनों तक पानी नहीं आता, जिसके चलते उन्हें मजबूरी में नदी का सहारा लेना पड़ता है।

नदी की सूरत बदली तो हालात बिगड़ गए

पुष्पा और उनकी बहन शांति बताती हैं कि उनकी उम्र 60 साल पार कर चुकी है। पहले उनके गांव की मनकुंवर नदी में पानी की कोई कमी नहीं रहती थी और यह सालभर बहती रहती थी। उस समय गांव का भू-जल स्तर भी अच्छा बना रहता था, जिससे हैंडपंपों में भी खूब पानी आता था। मगर अब हालात इस कदर बदल गए हैं कि वही हैंडपंप बड़ी मुश्किल से पानी उगलते हैं और वह पानी भी पीने लायक नहीं रह गया है, उसका रंग लाल पड़ चुका है।

बेतहाशा उत्खनन बना संकट की जड़

ग्रामीण बताते हैं कि बीते वर्षों में नदी में काफी रेत हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ इतना उत्खनन हुआ कि नदी से रेत ही खत्म हो गई। इसका असर यह हुआ कि सिर्फ नदी ही नहीं, बल्कि पूरे गांव का भू-जल स्तर गिरने लगा।

दरअसल, नदियों में मौजूद रेत केसिंग का काम करती है, जो प्राकृतिक रूप से वॉटर हार्वेस्टिंग जैसी है। रेत पानी के बहाव को धीमा करती है और पानी ऊर्ध्वाधर ढंग से नीचे की ओर जाता है, जिससे ग्राउंड लेवल का पानी रिचार्ज होता रहता है। इस प्रक्रिया से जमीन के नीचे पानी की किल्लत नहीं होती।

धरोहर को सहेजने की दरकार

नदियों को बचाने से पानी भी बचाया जा सकता है। ग्रामीणों की मांग है कि पंचायत और पीएचई विभाग ग्रामीण अंचलों की नल जल योजना को सुचारू रूप से चलाने के लिए संसाधनों को बेहतर बनाएं, ताकि हर दिन पानी मिलता रहे और लोगों को झिरिया बनाकर पानी पीने की नौबत न आए।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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