असम में बाढ़ का क्रूर चेहरा: इलाज नहीं मिला तो गई जान, अब अंतिम संस्कार के लिए भी सूखी जमीन को तरसे परिजन राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 3
असम के नुमालीगढ़ में बाढ़ की भयावह स्थिति के बीच एक परिवार का दुखद संघर्ष सामने आया है, जहां बीमारी के कारण युवक की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए जमीन न मिलने पर नाव का सहारा लेना पड़ा। राज्य में बाढ़ से मरने वालों का आंकड़ा अब 101 तक पहुंच चुका है।

बाढ़ ने छीनी आखिरी उम्मीद

असम में पिछले कुछ समय से जारी बाढ़ की विनाशकारी लहर ने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त व्यस्त कर दिया है। हालांकि राज्य के कुछ हिस्सों में बाढ़ का पानी धीरे धीरे उतर रहा है, लेकिन यह राहत अभी बहुत कम है। असल में उन लोगों की परेशानियां और अधिक बढ़ गई हैं जिनके घर, खेत और रास्ते अभी भी पानी में डूबे हुए हैं। इसी कड़ी में मरांगी के केंदुगुड़ी नंबर-2 इलाके से सामने आई एक हृदयविदारक घटना ने बाढ़ की त्रासदी का असली चेहरा दिखा दिया है। इस घटना में एक 28 वर्षीय युवक निर्मल ओरांग को न केवल इलाज के अभाव में अपनी जान गंवानी पड़ी, बल्कि मरणोपरांत उन्हें सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने के लिए परिवार को दर दर की ठोकरें खानी पड़ीं।

बीमारी और बेबसी का मंजर

निर्मल ओरांग अपने परिवार का इकलौता सहारा थे। उनके पिता का निधन पहले ही हो चुका था, जिसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उन पर थी। निर्मल काफी समय से बीमार चल रहे थे, लेकिन बाढ़ ने उन्हें इलाज से भी वंचित कर दिया। जब उनकी तबीयत अचानक ज्यादा खराब हुई, तो परिवार ने उन्हें अस्पताल ले जाने की हर संभव कोशिश की। दुर्भाग्यवश, उनका घर चारों तरफ से पानी से घिरा हुआ था। बाढ़ का स्तर इतना अधिक था कि घर से बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं बचा था। समय पर सही इलाज न मिल पाने के कारण अंततः निर्मल ने अपने ही घर में दम तोड़ दिया, जिससे पूरा परिवार गहरे सदमे में डूब गया।

नाव पर अंतिम विदाई की लाचारी

निर्मल की मौत के बाद परिवार की मुसीबतें कम नहीं हुईं। अंतिम संस्कार करना तो दूर, उनके पास अपने ही घर के परिसर में शव को रखने तक के लिए सूखी जमीन नहीं बची थी। आसपास के सभी इलाके जलमग्न थे, जिससे दाह संस्कार के लिए जरूरी जगह तलाशना एक बड़ी चुनौती बन गया था। हार मानकर परिवार ने अंततः एक छोटी देशी नाव का सहारा लिया। उन्होंने निर्मल के पार्थिव शरीर को उस नाव पर रखा और बाढ़ के पानी के बीच सुरक्षित ठिकाने की खोज शुरू की। लंबी जद्दोजहद के बाद, वे एक बांस के झुरमुट के पास पहुंचे, जहां जमीन का एक टुकड़ा पानी के स्तर से थोड़ा ऊंचा था। वहां पर, मात्र चार रिश्तेदारों की उपस्थिति में, बड़ी मुश्किल से निर्मल का अंतिम संस्कार संपन्न किया गया। इस पूरी प्रक्रिया को देख रहे लोगों के लिए यह दृश्य बेहद भावुक और विचलित करने वाला था।

नुमालीगढ़ और आसपास के इलाकों का हाल

नुमालीगढ़ क्षेत्र में पानी भले ही कुछ कम हुआ हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी चिंताजनक है। वेलाऊ गुढ़ी, कुमलिया चापोरी, चेसामुख, अवार घाट, शौंतली घाट, नंबर-3 कैवर्त गांव, कोरदोई गुढ़ी, केंदुगुड़ी, जाति पटिया और गांधी गांव जैसे स्थानों पर अभी भी भारी जलभराव है। स्थानीय लोग राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हैं और अपने घरों की स्थिति को लेकर आशंकित हैं। उनके मन में केवल एक ही सवाल है कि जब पानी पूरी तरह से उतरेगा, तो वे अपने खेतों और घरों को किस हाल में पाएंगे। बाढ़ ने न केवल उनकी जीविका छीनी है, बल्कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में उन्हें असहाय छोड़ दिया है।

असम में बाढ़ से हाहाकार

यह घटना बाढ़ की उस भयावहता का हिस्सा है, जिसमें असम राज्य पूरी तरह घिरा हुआ है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल असम में बाढ़ की चपेट में आकर मरने वालों की कुल संख्या 101 हो गई है। इसके अलावा, कई लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश करना बचाव दलों के लिए भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। निर्मल ओरांग का परिवार न केवल अपने एकलौते बेटे को खोने के गम में डूबा है, बल्कि यह भी जानता है कि सरकारी और सामुदायिक स्तर पर राहत कार्य कितनी मुश्किल स्थितियों के बीच चल रहे हैं। इलाज की कमी, परिवहन का अभाव और अंतिम विदाई की लाचारी, यह पूरी स्थिति बाढ़ से प्रभावित असम की उस दुखद सच्चाई को बयां करती है, जिसे शब्दों में पिरोना कठिन है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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