मिस्र के रेगिस्तान में छिपा था करोड़ों साल पुराना राज: अबू-तरतूर के पठार पर मिला प्राचीन शार्क का कब्रिस्तान विश्व 3 घंटे पहले 7
मिस्र के बंजर रेगिस्तान में वैज्ञानिकों ने एक हैरान कर देने वाली खोज की है, जहां कभी विशाल समुद्र हुआ करता था। अबू-तरतूर पठार से मिली शार्क की सात प्रजातियों के दांतों ने करोड़ों साल पुराने समुद्री इकोसिस्टम की एक अनकही कहानी बयां की है।

मिस्र के सूखे रेगिस्तान में मिले विशाल समुद्र के प्रमाण

मिस्र के रेगिस्तान का नाम लेते ही आंखों के सामने रेतीले टीले और भीषण गर्मी का दृश्य उभरता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है जिसने इतिहास की एक पूरी तस्वीर को ही बदल दिया है। इजिप्ट के अबू-तरतूर पठार पर रिसर्चर्स को एक प्राचीन शार्क कब्रिस्तान मिला है। यह इलाका आज भले ही पूरी तरह सूखा और बंजर दिखाई देता हो, लेकिन करोड़ों साल पहले क्रेटेशियस काल के दौरान यहां पानी का एक गहरा और विशाल साम्राज्य हुआ करता था। उत्तरी अफ्रीका का एक बड़ा हिस्सा उस समय समुद्र में डूबा हुआ था। काहिरा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने जब इस इलाके की खुदाई की, तो उन्हें शार्क के अनगिनत दांत मिले। यह खोज प्रमाणित करती है कि कभी यह रेगिस्तानी इलाका खूंखार शिकारी समुद्री जीवों का घर हुआ करता था।

धरती का वह रूप जो आज से बिल्कुल अलग था

पृथ्वी का स्वरूप हमेशा से ऐसा नहीं रहा जैसा हम आज देखते हैं। आज से लगभग 145 से 66 मिलियन साल पहले क्रेटेशियस काल में हमारी दुनिया का तापमान आज की तुलना में काफी ज्यादा था। उस समय ध्रुवों पर बर्फ नाम मात्र की भी नहीं थी। तापमान अधिक होने के कारण समुद्र का जलस्तर आज की अपेक्षा बहुत ऊपर था, जिससे दुनिया की बड़ी जमीनें पानी के नीचे समाई हुई थीं। इसमें उत्तरी अफ्रीका का बड़ा भूभाग भी शामिल था। टेक्टोनिक प्लेट्स में आए बदलावों के कारण यहां एक विशाल समुद्र बन गया था, जिसका अवशेष आज अबू-तरतूर का पठार है। आज यह जगह भले ही रेतीली हो गई हो, लेकिन यहां की चट्टानों में दबे जीवाश्म उस कालखंड की पूरी दास्तां सुनाते हैं।

फास्फेट भंडार और समुद्री जीवन का गहरा संबंध

इस सूखी जमीन की गहराई में फास्फेट के विशाल भंडार दबे हुए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, फास्फेट का जमाव वहां अधिक होता है जहां समुद्री जीवन अत्यंत सक्रिय और समृद्ध रहा हो। अबू-तरतूर का 'डुवी फॉर्मेशन' प्राचीन समुद्र का एक जीवंत प्रमाण है। यह साबित करता है कि उस समय का समुद्री जल अत्यधिक पोषक तत्वों से भरपूर और उपजाऊ था। काहिरा यूनिवर्सिटी के रिसर्चर तारेक यासीन की अगुवाई में उनकी टीम ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया है। उनके निष्कर्ष 'क्रेटेशियस रिसर्च' नाम के जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। यासीन की टीम को पिछली रिसर्च के दौरान शार्क की दो प्रजातियों के दांत मिले थे, जो इस बात का संकेत था कि यह क्षेत्र शिकारियों का केंद्र रहा होगा। इसके बाद टीम ने और अधिक गहराई से छानबीन शुरू की।

नई प्रजातियों का हुआ बड़ा खुलासा

डुवी फास्फेट की काली और पीली परतों के नीचे से शोधकर्ताओं को और भी कई राज मिले हैं। खुदाई के दौरान उन्हें शार्क के 14 और दांत प्राप्त हुए, जो पांच नई प्रजातियों से संबंधित थे। इन प्रजातियों के जीवाश्म अबू-तरतूर में पहले कभी दर्ज नहीं किए गए थे। हालांकि शार्क की पहचान करना चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि अक्सर उनके कंकाल नहीं मिलते, केवल दांत ही शेष रहते हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि दांतों की बनावट में मामूली अंतर से ही प्रजाति का पता चलता है। कुछ दांत सुई की तरह पतले और लंबे थे, तो कुछ किनारे से आरी की तरह धारदार थे, जो शिकार को चीरने-फाड़ने के लिए आदर्श थे। इनमें से कुछ जीवाश्म तो पूरे इजिप्ट के लिए पहली बार खोजे गए हैं।

कौन-कौन से शिकारी करते थे इस समुद्र में राज?

वैज्ञानिकों द्वारा पहचान की गई इन पांच प्रजातियों ने उस समय के समुद्री जीवन को स्पष्ट कर दिया है। इनमें 'क्रेटालम्ना सीएफ मैरोकाना', 'स्कैपानोरिन्चस सीएफ रैफियोडोन', 'सेराटोलम्ना सीएफ सेराटा' और 'स्क्वैलिकोरैक्स' की दो प्रजातियां शामिल हैं। इनमें से एक दांत का आकार 'करमबिट' चाकू की तरह घुमावदार था, जो उस समय के खूंखार शिकारियों की मौजूदगी को दर्शाता है। सुई जैसे दांत वाली शार्क की खोज विशेष रूप से हैरान करने वाली है, क्योंकि अफ्रीका में इस प्रजाति का यह पहला ज्ञात जीवाश्म हो सकता है। यह साबित करता है कि उस समय अलग-अलग प्रकार की कई शार्क एक साथ इस पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद थीं।

इकोसिस्टम का तालमेल और शिकार का तरीका

क्या ये सभी शार्क आपस में लड़ती थीं? वैज्ञानिकों का मानना है कि वे अलग-अलग वातावरण में अपना स्थान बनाकर रहती थीं। उनके दांतों की बनावट उनके भोजन करने के तरीके को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, 'स्क्वैलिकोरैक्स' की प्रजाति तट के करीब शिकार करती थी, जबकि 'स्कैपानोरिन्चस' गहरे पानी की निवासी थी। वहीं कुछ प्रजातियां खुले समुद्र में विचरण करना पसंद करती थीं। उस समय वहां मछलियों और प्लैंकटन की प्रचुरता थी। समुद्र की गहराई से ऊपर आने वाले पोषक तत्व पानी को जीवन से भर देते थे, जिससे छोटे जीव फलते-फूलते थे और वे बड़ी मछलियों व शार्क का आहार बनते थे। यह एक पूर्ण और विकसित इकोसिस्टम था जो लाखों वर्षों तक कायम रहा।

क्या ये सभी एक ही समय में मरी थीं?

यह शार्क कब्रिस्तान अपने आप में एक दिलचस्प पहेली है। वहां जमा फास्फेट बेड यह दर्शाता है कि यह जमावड़ा किसी एक घटना में नहीं हुआ था। वहां तलछट धीरे-धीरे जमा होती थी, इसलिए यह परत लंबी समय अवधि को समेटे हुए है। इसका मतलब है कि ये शार्क अलग-अलग कालखंडों में मरी थीं और उनकी हड्डियां वहां इकट्ठी होती गईं। उत्तरी अफ्रीका के अन्य क्षेत्रों जैसे मोरक्को और सीरिया में भी ऐसे ही फास्फेट भंडार मिले हैं, जो यह बताते हैं कि उस समय पूरी तटीय रेखा पर ऐसा इकोसिस्टम आम था।

खोई हुई दुनिया की आखिरी निशानी

आज वह विशाल 'टेथिस' सागर लुप्त हो चुका है और उसकी जगह रेगिस्तान ने ले ली है। हालांकि, चट्टानों में दबे ये दांत हमें उस समय की याद दिलाते हैं जब यहां चारों तरफ पानी का राज था। रिसर्च के अनुसार, 'लैम्निफॉर्म' शार्क जैसी प्रजातियों की उपस्थिति यह बताती है कि वहां का वातावरण काफी स्थिर और शांत था। वहां लगातार होने वाले बदलावों ने इस क्षेत्र को शार्क के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया था। वैज्ञानिकों की यह नई खोज अब पुराने डेटा को दोबारा खंगालने और इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को नए नजरिए से समझने के लिए मजबूर कर रही है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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