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आधुनिक रसोई के दौर में प्राचीन परंपरा का वैज्ञानिक रहस्य
आजकल लगभग हर घर के रसोईघर में गैस चूल्हा, प्रेशर कुकर और तरह-तरह के नॉन-स्टिक बर्तनों की मौजूदगी एक सामान्य बात बन चुकी है। हालांकि, करीब 200 से 500 साल पहले की स्थिति इससे काफी अलग थी। उस दौर में लोग भोजन पकाने के लिए केवल आधुनिक सुविधाओं पर निर्भर नहीं थे, बल्कि अपनी सेहत को ध्यान में रखकर बर्तनों का चयन करते थे। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में स्थित वाईके एंटीक्स होम म्यूजियम में संग्रहित ऐतिहासिक और प्राचीन बर्तन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण पेश करते हैं कि हमारे पूर्वजों का रसोई विज्ञान कितना उन्नत और तर्कसंगत था।
संग्रहालय में रखे गए ये दुर्लभ बर्तन यह स्पष्ट दर्शाते हैं कि उस समय खाना बनाना केवल पेट भरने का जरिया नहीं था। यह रोजमर्रा के जीवन में शरीर की सेहत, पाचन शक्ति और शारीरिक संतुलन को बेहतर बनाए रखने का एक बेहद सटीक माध्यम हुआ करता था। धातुकर्म और व्यंजन विज्ञान के इस अनूठे जुड़ाव के तहत हर एक खास पकवान के लिए एक विशिष्ट धातु या सामग्री का बर्तन तय किया जाता था।
शरीर को मिलने वाले पोषण का अनूठा गणित
प्राचीन भारतीय आहार प्रणाली में इस बात का सूक्ष्म विश्लेषण मौजूद था कि इंसान को मिलने वाले कुल पोषण में किस तत्व की कितनी हिस्सेदारी होती है। वाईके एंटीक्स होम म्यूजियम के शोध और जानकारियों के आधार पर पोषण का यह गणित कुछ इस तरह काम करता था:
- 80 प्रतिशत पोषण का मुख्य स्रोत आपके द्वारा उपयोग किए जाने वाले कच्चे अनाज और ताजी सब्जियां होती हैं।
- 15 प्रतिशत योगदान उस बर्तन का होता है, जिसमें भोजन को अग्नि पर पकाया जाता है।
- 5 प्रतिशत योगदान उस थाली या बर्तन का होता है, जिसमें खाना परोसा और खाया जाता है।
यही वजह थी कि उस जमाने में केवल खाद्य सामग्री पर ही ध्यान नहीं दिया जाता था, बल्कि इस बात का भी पूरा ध्यान रखा जाता था कि खाना किस धातु के बर्तन में तैयार हो रहा है।
चावल और दाल पकाने के लिए बर्तनों का वैज्ञानिक चयन
संग्रहालय के संस्थापक येल्लाप्रगदा कृष्ण राव के अनुसार, सदियों पहले अलग-अलग खाद्य पदार्थों की प्रकृति के अनुसार ही उनके लिए खास बर्तनों को चुना जाता था:
- पीतल के बर्तन में चावल: प्राचीन समय में चावल पकाने के लिए मुख्य रूप से पीतल के बर्तनों का प्रयोग होता था। पीतल असल में तांबे और जस्ते (जिंक) का एक मिश्रण होता है। जब इसमें चावल पकता था, तो ये दोनों आवश्यक खनिज पदार्थ स्वाभाविक रूप से भोजन में शामिल होकर शरीर को मजबूती प्रदान करते थे।
- कांसे के बर्तन में दाल: दालों को प्रोटीन से भरपूर लेकिन पाचन के लिहाज से काफी भारी माना जाता है। इसलिए दाल पकाने के लिए कांसे (ब्रांज) के बर्तन का इस्तेमाल किया जाता था, जो तांबे और टिन के मिश्रण से तैयार होता है। कांसे में पकने से दाल सुपाच्य बनती थी और शरीर को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व कुदरती रूप से प्राप्त हो जाते थे।
खट्टी चीजों और सब्जियों को तैयार करने का खास नियम
प्राचीन रसोई विज्ञान में इस बात को लेकर बेहद सतर्कता बरती जाती थी कि कौन सा खाद्य पदार्थ किस धातु के साथ कैसी प्रतिक्रिया कर सकता है। रासायनिक अभिक्रियाओं के खतरों से बचने के लिए कई नियम बनाए गए थे:
- पत्थर के बर्तनों में सांभर और खटाई: इमली, सांभर, रसम या किसी भी प्रकार के खट्टे व्यंजनों को कभी भी धातु के बर्तनों में नहीं पकाया जाता था। इसका मुख्य कारण यह था कि खट्टे अम्ल धातुओं से क्रिया करके हानिकारक रसायन बना सकते थे। इसके बजाय इन्हें प्राकृतिक पत्थरों से तराशे गए बर्तनों में पकाया जाता था, जिससे खाने में कई तरह के प्राकृतिक मिनरल्स अपने आप जुड़ जाते थे।
- लोहे की कड़ाही में सब्जियां: हरी सब्जियों को भूनने या तलने के लिए भारी लोहे की कड़ाही का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता था। लोहे के बर्तन में सब्जी पकने से भोजन में आयरन का स्तर बढ़ता था, जिससे शरीर में खून की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न नहीं होती थीं।
इस तरह की सोची-समझी प्राचीन खान-पान शैली बिना किसी बाहरी दवा या सप्लीमेंट के परिवार के हर सदस्य को निरोगी और ऊर्जावान बनाए रखने में मददगार साबित होती थी। हैदराबाद के इस म्यूजियम में मौजूद ऐतिहासिक संग्रह आज की पीढ़ी को अपने समृद्ध और वैज्ञानिक इतिहास से फिर से जोड़ने का काम कर रहा है।
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