हीलियम-3: 1.89 लाख रुपये लीटर बिकने वाली गैस, चांद की मिट्टी में दबा अरबों का खजाना; इसे पाने की होड़ शुरू विश्व एक घंटा पहले 4
चांद की सतह पर मौजूद दुर्लभ गैस हीलियम-3 की कीमत करीब 1.89 लाख रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। क्वांटम कंप्यूटिंग और न्यूक्लियर फ्यूजन के लिए जरूरी इस गैस को निकालने के लिए अमेरिकी कंपनियां इंटरल्यून और एस्ट्रोटेक 2027 तक चांद पर माइनिंग की तैयारी में जुटी हैं।

चांद की सतह पर एक ऐसी दुर्लभ गैस मौजूद है, जो आने वाले वर्षों में दुनिया भर की टेक्नोलॉजी की तस्वीर बदल सकती है। इस गैस का नाम हीलियम-3 है और इसके दाम लगातार ऊंचाई की ओर बढ़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके एक लीटर की कीमत 2,000 डॉलर यानी करीब 1.89 लाख रुपये से अधिक हो चुकी है।

इसी ऊंची कीमत और बड़ी उपयोगिता के चलते दुनिया भर के वैज्ञानिकों और स्पेस स्टार्टअप्स के बीच इसे हासिल करने की दौड़ छिड़ गई है। यह रेयर गैस क्वांटम कंप्यूटिंग और सुपरकूलिंग जैसी उन्नत तकनीकों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। भविष्य में बनने वाले न्यूक्लियर फ्यूजन प्लांट्स के लिए भी यह ईंधन की भूमिका निभाएगी। पृथ्वी पर इसकी भारी कमी के कारण अब निजी कंपनियां इसे चांद से निकालने की योजना बना रही हैं, और इसके लिए अमेरिकी स्टार्टअप्स खास मशीनें तथा रोवर तैयार कर रहे हैं।

सामान्य हीलियम से कितनी अलग है यह गैस?

हीलियम-3 दरअसल हीलियम गैस का ही एक बेहद खास और दुर्लभ आइसोटोप है, जिसके बारे में आम लोगों को बहुत कम जानकारी है। सामान्य हीलियम की तुलना में इसके एटॉमिक न्यूक्लियस में एक न्यूट्रॉन कम होता है और यही छोटा-सा अंतर इसे बेहद उपयोगी बना देता है।

मौजूदा समय में हीलियम-3 का बड़ा हिस्सा न्यूक्लियर वेपन्स के स्टॉकपाइल से प्राप्त होता है, जहां ट्रिटियम के डिके होने की न्यूक्लियर रिएक्शन से यह गैस बनती है। पृथ्वी पर इसकी मात्रा इतनी कम है कि मांग पूरी नहीं हो पाती, इसी वजह से वैज्ञानिक इसके नए स्रोत तलाश रहे हैं।

क्वांटम कंप्यूटिंग में क्यों है इतनी जरूरी?

वैज्ञानिक अपने शोध में हीलियम-3 का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। इसकी विशिष्ट प्रॉपर्टीज इसे उन्नत विज्ञान के लिए वरदान बनाती हैं। क्वांटम कंप्यूटर्स को काम करने के लिए बेहद कम तापमान चाहिए होता है और इन्हें सुपरकूलिंग देने में हीलियम-3 सबसे कारगर साबित होती है। इसके अलावा डार्क मैटर की खोज और पार्टिकल फिजिक्स के प्रयोगों में भी इसका उपयोग होता है।

आने वाले समय में क्वांटम कंप्यूटिंग का चलन तेजी से बढ़ने वाला है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एक बड़े क्वांटम कंप्यूटर को चलाने के लिए हजारों लीटर हीलियम-3 की जरूरत पड़ेगी, जबकि मौजूदा उत्पादन क्षमता इस मांग को पूरा करने में पूरी तरह नाकाफी है।

चांद की मिट्टी से कैसे निकलेगी यह गैस?

पृथ्वी पर कमी होने के कारण अब वैज्ञानिकों की निगाहें चांद की सतह पर टिक गई हैं। नासा के अपोलो मिशन के दौरान लाए गए सैंपल्स से एक चौंकाने वाली बात सामने आई थी। चांद की सबसे ऊपरी परत को रेगोलिथ कहा जाता है और इसी मिट्टी में हीलियम-3 बड़ी मात्रा में मौजूद है। अरबों वर्षों से सोलर विंड के पार्टिकल्स चांद की सतह से टकरा रहे हैं और इसी प्रक्रिया के कारण यह गैस वहां की मिट्टी में जमा हो गई है।

हालांकि चांद से इसे निकालना आसान काम नहीं है। शोध के मुताबिक हीलियम-3 वहां बेहद कम कंसंट्रेशन में मौजूद है। एक किलोग्राम हीलियम-3 हासिल करने के लिए लाखों टन चांद की मिट्टी को प्रोसेस करना पड़ सकता है।

कौन-सी कंपनियां लगा रही हैं अरबों डॉलर का दांव?

इस दुर्लभ गैस को धरती पर लाने के लिए कुछ बड़ी निजी कंपनियां चांद पर माइनिंग की तैयारी में जुट गई हैं। सिएटल की इंटरल्यून कंपनी इस रेस में सबसे आगे है। इस कंपनी की शुरुआत अपोलो 17 के एस्ट्रोनॉट हैरिसन श्मिट और ब्लू ओरिजिन के पूर्व प्रेसिडेंट ने मिलकर की है। यह कंपनी चांद की मिट्टी से हीलियम-3 निकालने के लिए खास उपकरण बना रही है।

इंटरल्यून चांद पर ऑटोनॉमस एक्सकेवेटर यानी खुद चलने वाली खुदाई मशीनें भेजने की योजना बना रही है। ये मशीनें वहां की मिट्टी इकट्ठा कर उसे गर्म करेंगी, जिससे उसमें फंसी हीलियम-3 गैस बाहर निकल आएगी। कंपनी का दावा है कि वह 2027 तक इस तकनीक का परीक्षण करने के लिए चांद पर मिशन भेज सकती है। इसके अलावा एस्ट्रोटेक कॉर्पोरेशन भी स्पेसएक्स के स्टारशिप मिशन के जरिए वहां माइनिंग उपकरण भेजने की तैयारी कर रही है। इंटरल्यून ने एक क्वांटम कंप्यूटिंग कंपनी के साथ अगले दस साल के लिए 300 मिलियन डॉलर की सप्लाई का एग्रीमेंट भी साइन कर लिया है।

क्या पृथ्वी पर ही मिल सकता है विकल्प?

चांद से माइनिंग कर उसे पृथ्वी तक लाने में भारी निवेश और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी। कुछ आलोचकों का मानना है कि चांद पर जाने के बजाय पृथ्वी पर ही इसके स्रोत खोजना अधिक समझदारी होगी। पुर्तगाल की पल्सर हीलियम नामक कंपनी अमेरिका के मिनेसोटा में हीलियम-3 के डिपॉजिट्स की जांच कर रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पारंपरिक ड्रिलिंग तकनीक से भी पृथ्वी के भीतर से इस आइसोटोप को निकाला जा सकता है और इसके लिए चांद पर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

दूसरी ओर, कुछ वैज्ञानिक ऐसी वैकल्पिक कूलिंग तकनीक पर भी काम कर रहे हैं, जिसमें हीलियम-3 की जरूरत ही न पड़े। इन सबके बावजूद चांद की हीलियम-3 में लोगों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। क्लीन एनर्जी और एडवांस कंप्यूटिंग के इस दौर में यह गैस स्पेस इंडस्ट्री का सबसे बड़ा खजाना बनती जा रही है।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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