H-1B वीजा धारकों को बंधुआ मजदूर बताने पर विवादों में जेडी वेंस, अपनी सफाई में पत्नी के परिवार का दिया हवाला विश्व 3 घंटे पहले 5
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने H-1B वीजा कर्मचारियों को विदेशी बंधुआ मजदूर कहने वाली अपनी विवादित टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य अप्रवासियों का अपमान करना नहीं था और इसके लिए उन्होंने अपने भारतीय मूल के ससुराल पक्ष का उदाहरण दिया।

विवादित टिप्पणी पर उपराष्ट्रपति की सफाई

अमेरिका में विदेशी पेशेवरों और H-1B वीजा प्रणाली को लेकर छिड़ी बहस के बीच, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने हालिया बयान पर सफाई पेश की है। उन्होंने एच-1बी वीजा धारकों को 'विदेशी बंधुआ मजदूर' की संज्ञा दी थी, जिसके बाद से ही उनकी काफी आलोचना हो रही थी। अब वेंस ने माना है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों के चयन में गलती हो सकती है। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताएं पूरी तरह से वाजिब हैं और वह इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटेंगे। अपनी बात को बेहतर तरीके से रखने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी उषा वेंस के भारतीय मूल के परिवार का जिक्र किया।

पत्नी के परिवार और व्यक्तिगत दृष्टिकोण का महत्व

वेंस ने स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी भी अप्रवासी को ठेस पहुंचाना या उनका अनादर करना कतई नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके सास-ससुर दक्षिण भारत से अमेरिका आए थे और आज उनकी बेटी अमेरिका की सेकंड लेडी के रूप में प्रतिष्ठित पद पर हैं। उपराष्ट्रपति ने कहा, मैं स्वयं कई अप्रवासियों से बहुत स्नेह रखता हूं। मेरे सास-ससुर भारत से आकर यहां बसे और मेरी पत्नी पर मुझे बहुत गर्व है। उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि उनका दृष्टिकोण व्यक्तिगत संबंधों से अलग है और वह सिर्फ उस व्यवस्था की कमियों को उजागर करना चाहते हैं, जिसका फायदा उठाकर कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को काम पर रखती हैं।

थिंग्स दैट मैटर कार्यक्रम में उठा सवाल

अमेरिकी चैनल CBS न्यूज के कार्यक्रम 'थिंग्स दैट मैटर – अ टाउन हॉल विद वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस' के दौरान एक नागरिक ने वेंस से उनके पुराने बयान को लेकर तीखे सवाल किए। निव अगरम नाम की एक नागरिक ने, जो करीब 20 साल पहले अमेरिका आई थीं, अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देश में सीमा सुरक्षा और नशीले पदार्थों के अलावा अप्रवासियों के प्रति बढ़ता नकारात्मक रुख चिंताजनक है। उन्होंने पूछा कि सरकारी विफलताओं के लिए अप्रवासियों को बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है, जिससे समाज में असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है। इस पर वेंस ने विनम्रता से स्वीकार किया कि यदि उनकी भाषा से किसी को दुख पहुंचा है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उनकी है। उन्होंने दोहराया कि वह किसी को अमानवीय नहीं बताना चाहते थे।

H-1B वीजा प्रणाली में खामियों का आरोप

वेंस ने अपने बचाव में H-1B वीजा प्रणाली की तकनीकी बारीकियों का जिक्र किया। उनके अनुसार, यह व्यवस्था विदेशी कर्मचारियों को उनके एंप्लॉयर या कंपनी के प्रति अत्यधिक निर्भर बना देती है। वीजा नियमों के तहत, कंपनी को यह प्रमाणित करना होता है कि उसे काम के लिए कोई उपयुक्त अमेरिकी नागरिक नहीं मिला। इसके चलते विदेशी कर्मचारी की नौकरी और उसका अमेरिका में कानूनी प्रवास एक-दूसरे से गहराई से जुड़ जाते हैं। यदि कर्मचारी का अपने बॉस से कोई विवाद हो जाए या उसकी नौकरी छूट जाए, तो उसके लिए अमेरिका में टिके रहना बेहद कठिन हो जाता है। वेंस के मुताबिक, यही निर्भरता कंपनियों को कर्मचारियों पर अनुचित दबाव डालने की ताकत देती है, जिसे उन्होंने बंधुआ मजदूरी की उपमा दी थी।

बड़ी कंपनियों और स्थानीय नौकरियों पर तर्क

उपराष्ट्रपति ने बड़ी कंपनियों के कामकाज के तरीके पर भी सवाल उठाए। उन्होंने एक काल्पनिक स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई एक खरब डॉलर की कंपनी यह दावा करे कि उसे कोई अकाउंटेंट नहीं मिल रहा और वह किसी अमेरिकी कर्मचारी को हटाकर विदेश से व्यक्ति बुलाती है, तो यह स्थानीय कर्मचारियों के हितों के खिलाफ है। उनके तर्क के अनुसार, यह व्यवस्था न केवल अमेरिकी कामगारों के लिए नुकसानदेह है, बल्कि यह खुद विदेशी कर्मचारी के लिए भी शोषणकारी हो सकती है। उनका मानना है कि वर्तमान प्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता है ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

सामाजिक सामंजस्य और सामुदायिक पहचान

वेंस ने इस दौरान सामाजिक सामंजस्य यानी सोशल कोहेशन का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वह ऐसे देश की परिकल्पना करते हैं जहां लोगों के बीच साझा पहचान और समुदाय की गहरी भावना हो। उन्होंने तर्क दिया कि यदि बहुत कम समय में भारी संख्या में बाहरी लोग किसी देश में आते हैं, तो वहां की सामाजिक संरचना और ताना-बाना बदल सकता है। उन्होंने अपने पड़ोस का हवाला देते हुए कहा कि कभी-कभी लोग अपने आसपास अपनी भाषा बोलने वाला एक भी व्यक्ति नहीं पा पाते। उन्होंने साफ किया कि यह किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह एक सामान्य चिंता है कि लोग अपने आस-पड़ोस में उन लोगों के साथ रहना चाहते हैं जिनसे उनकी कुछ समानताएं हों। अंत में, उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अप्रवासियों के प्रति उनका राजनीतिक स्टैंड और उनके परिवार के प्रति उनका व्यक्तिगत प्रेम, दो अलग-अलग विषय हैं जिन्हें मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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