प्रयागराज: गोबर से मूर्तियां और दीये बनाकर आत्मनिर्भर बनी महिलाएं, बदल गई समाज की सोच उत्तर प्रदेश एक घंटा पहले 6
प्रयागराज की महिलाओं ने गोबर से गौरी-गणेश की मूर्तियां और दीये बनाकर रोजगार का नया मॉडल पेश किया है। अब यह काम केवल घरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े पैमाने पर राज्य और देश के अन्य हिस्सों तक पहुंच चुका है।

पर्यावरण संरक्षण के साथ स्वरोजगार की अनोखी पहल

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महिलाओं का एक समूह इन दिनों मिसाल पेश कर रहा है। यहाँ की महिलाएं केवल गोबर से दीये और मूर्तियां बनाकर न केवल पर्यावरण को बचा रही हैं, बल्कि खुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बना रही हैं। एक समय था जब इस काम को लेकर समाज में कई तरह की नकारात्मक बातें सुनने को मिलती थीं, लेकिन आज इन महिलाओं के बनाए उत्पादों की मांग प्रयागराज ही नहीं, बल्कि अन्य जिलों और राज्यों में भी तेजी से बढ़ रही है।

वर्तिका स्वयं सहायता समूह की शुरुआत

इस पूरी मुहिम की शुरुआत वर्तिका स्वयं सहायता समूह के माध्यम से हुई। समूह की प्रमुख वर्तिका द्विवेदी ने बताया कि इस विचार का बीजारोपण करीब छह साल पहले हुआ था। गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर कुछ महिलाएं एक साथ मिलकर चर्चा कर रही थीं, तभी उन्होंने आपस में गौरी-गणेश की मूर्तियां बनाने का निर्णय लिया। इसी छोटे से प्रयास ने गोबर से पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद बनाने की एक बड़ी योजना को जन्म दिया। हालांकि, शुरुआत का सफर कतई आसान नहीं था। जब उन्होंने लोगों को बताया कि वे गोबर से मूर्तियां और दीये बनाना चाहती हैं, तो लोग उन पर हंसते थे। समाज के कुछ लोग ताना मारते हुए पूछते थे कि क्या गोबर बेचकर कोई कभी आगे बढ़ सकता है।

उत्पादन का लक्ष्य और चुनौतियां

शुरुआती दौर में समूह का लक्ष्य हर साल पांच से दस हजार दीये और मूर्तियां तैयार करने का रहता था। लेकिन इस बार महिलाओं ने अपनी मेहनत के दम पर उत्पादन को काफी बढ़ा दिया है। इस साल तैयार की गई मूर्तियों की संख्या 10 हजार के आंकड़े को पार कर गई है। इस बार के काम में मौसम की चुनौती भी सामने आई। अत्यधिक बारिश के चलते मूर्तियों को सुखाना एक बड़ी समस्या बन गया था। इसे हल करने के लिए समूह की महिलाओं ने ड्रायर का सहारा लिया, ताकि समय पर ऑर्डर पूरे किए जा सकें। समूह की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे अब अपने कारोबार को व्यवस्थित करने के लिए जीएसटी पंजीकरण के लिए भी आवेदन कर चुके हैं।

400 से अधिक महिलाओं का कारवां

यह मुहिम केवल कुछ महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसमें 400 से अधिक महिलाएं जुड़ चुकी हैं। वर्तिका द्विवेदी प्रयागराज के अलावा कौशांबी, ललितपुर, फिरोजाबाद, कासगंज, बांदा, फर्रुखाबाद, बुलंदशहर और यहां तक कि राजस्थान के जैसलमेर तक की महिलाओं को इस काम से जोड़ चुकी हैं। वर्तिका खुद अलग-अलग जिलों में जाकर इन महिलाओं को प्रशिक्षण प्रदान करती हैं। उन्हें जिला नगरीय विकास अभिकरण यानी डूडा के स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर काम करने का शुरुआती अवसर मिला। इसके बाद बड़ौदा स्वरोजगार विकास संस्थान से उन्होंने विशेष ट्रेनिंग ली और अब उसी संस्थान के माध्यम से वह अन्य महिलाओं को भी कुशल बना रही हैं।

बदली हुई सामाजिक सोच

समूह की सदस्य शालिनी श्रीवास्तव बताती हैं कि वर्ष 2022 से वह इस काम में जुड़ी हैं। पहले उनके पास कोई काम नहीं था, लेकिन वह कुछ करना चाहती थीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें गोबर और गंगा की मिट्टी से मूर्तियां बनाने का काम मिला। शालिनी के अनुसार, शुरुआत में आसपास के लोग बहुत सी बातें करते थे, लेकिन उन्होंने उन पर ध्यान नहीं दिया। आज वही लोग उनके पास आते हैं और गर्व से उनसे ही दीये और मूर्तियां खरीदते हैं।

भविष्य की योजनाएं और लक्ष्य

समूह की एक और सदस्य रमा मलिक का कहना है कि बहराना में उन्होंने अपनी एक स्टॉल लगाई है, जहां लगभग पांच हजार दीये और मूर्तियां बिक्री के लिए रखी गई हैं। इस काम से जुड़ी महिलाएं अब अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में भी मदद कर रही हैं। वर्तिका द्विवेदी का आगामी लक्ष्य काफी बड़ा है। वह अगले साल तक 25 से 50 हजार मूर्तियां तैयार करने का लक्ष्य लेकर चल रही हैं, ताकि अधिक से अधिक महिलाओं को रोजगार से जोड़कर उन्हें सशक्त बनाया जा सके और इस पर्यावरण अनुकूल मॉडल को और अधिक विस्तार दिया जा सके।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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