भारत
2 घंटे पहले
3
विचारों
भारत की बढ़ती रक्षा ताकत
आज के दौर में जब वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों को एक नई ऊंचाई दी है। भारतीय रक्षा बेड़े में एक ऐसा स्वदेशी दिव्यास्त्र शामिल है, जिसकी रफ्तार और अचूक मारक क्षमता ने दुनिया भर को हैरान कर दिया है। यह मिसाइल न केवल ध्वनि की गति से 2.5 गुना तेजी से उड़ान भर सकती है, बल्कि 80 किलोमीटर की दूरी तक किसी भी हवाई खतरे को पहचान कर उसे पलक झपकते ही नेस्तनाबूद करने में सक्षम है। इस मिसाइल की अद्भुत क्षमताओं के कारण आज दुनिया के कई देश इसे ललचाई निगाहों से देख रहे हैं।
विकास यात्रा और इतिहास
चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत को एक ऐसे आधुनिक रक्षा तंत्र की आवश्यकता महसूस हुई जो दुश्मन के लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों और हवा से जमीन पर मार करने वाले हथियारों को सीमा के भीतर ही रोक सके। इसी उद्देश्य के साथ 1984 में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) की नींव रखी गई। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के अंतर्गत प्रो. प्रह्लाद रामाराव के नेतृत्व में 'आकाश' मिसाइल का विकास कार्य शुरू हुआ। छह साल के कठिन परिश्रम के बाद 1990 में इस मिसाइल ने अपनी पहली उड़ान भरी। 1997 तक इसके तकनीकी परीक्षण जारी रहे और 2005-2006 में ओडिशा के चांदीपुर में इसे अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा। दिसंबर 2007 में भारतीय वायु सेना ने इसके उपयोगकर्ता परीक्षण शुरू किए। पोखरण के तपते रेगिस्तान और ग्वालियर एयर फोर्स स्टेशन पर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच के बाद इसे भारतीय सुरक्षा चक्र का हिस्सा बनाया गया। इसे विकसित करने की कुल लागत लगभग ₹1,000 करोड़ आई, जो विश्व के अन्य देशों द्वारा ऐसे सिस्टम पर खर्च की गई राशि से 8 से 10 गुना कम है।
आकाश मिसाइल का सुरक्षा कवच
आकाश कोई एक अकेली मिसाइल नहीं है, बल्कि यह रडार, कंप्यूटर और लॉन्चर का एक चलता-फिरता किला है, जिसे सैन्य शब्दावली में बैटरी कहा जाता है। इसकी मारक क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक मिसाइल दागने पर लक्ष्य को नष्ट करने की संभावना 88 प्रतिशत होती है। यदि पांच सेकंड के अंतराल पर दो मिसाइलें दागी जाएं, तो दुश्मन के बचने की उम्मीद 98.5 प्रतिशत तक समाप्त हो जाती है।
राजेंद्र रडार: मिसाइल की आंखें
आकाश प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत इसका 'राजेंद्र' रडार है, जो मिसाइल के लिए आंख और दिमाग का काम करता है। यह 3D फेस्ड ऐरे रडार 60 किमी की दूरी से 64 लक्ष्यों पर एक साथ नजर रख सकता है और उनमें से 12 को एक साथ निशाना बनाने में सक्षम है। इसके साथ ही, 3D सेंट्रल एक्विजिशन रडार 150 से 180 किमी दूर से ही 200 खतरों को ट्रैक कर सकता है। एक बैटरी में चार लॉन्चर होते हैं और प्रत्येक लॉन्चर पर 3 मिसाइलें तैनात रहती हैं, यानी कुल 12 मिसाइलें एक साथ फायरिंग के लिए तैयार रहती हैं। यह सिस्टम पूरी तरह से मोबाइल है, जिससे इसे किसी भी ऊबड़-खाबड़ इलाके में आसानी से ले जाया जा सकता है।
तकनीकी विनिर्देश
इस मिसाइल का वजन 720 किलोग्राम, लंबाई 5.78 मीटर और व्यास 35 सेंटीमीटर है। यह मैक 2.5 की सुपरसोनिक गति से दौड़ती है। इसकी मारक क्षमता 25 से 45 किमी है और यह 20 किमी की ऊंचाई तक मार कर सकती है। इसमें इंटीग्रेटेड रैमजेट रॉकेट इंजन लगा है, जो हवा से ऑक्सीजन खींचकर पूरी उड़ान के दौरान रफ्तार को बनाए रखता है। इसमें 55 से 60 किलोग्राम का वारहेड लगा होता है, जिसमें प्रॉक्सिमिटी फ्यूज तकनीक शामिल है।
आकाश मार्क-1S और नई पीढ़ी के सुधार
अप्रैल 2014 के ट्रायल्स और 2017 की कैग रिपोर्ट के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने इसमें महत्वपूर्ण सुधार किए। आकाश मार्क-1S में 'एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर' लगाया गया, जिससे यह अपने अंतिम चरण में लक्ष्य को खुद ट्रैक कर लेती है। इसके बाद आया 'आकाश प्राइम', जिसे लद्दाख और सियाचिन जैसे अत्यधिक ठंडे और उच्च ऊंचाई वाले इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें 82 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी पुर्जों का उपयोग किया गया है।
आकाश-एनजी: भविष्य की तकनीक
आकाश-एनजी (न्यू जेनरेशन) इस श्रृंखला की सबसे आधुनिक मिसाइल है, जिसकी रेंज 70 से 80 किमी तक बढ़ गई है। ₹470 करोड़ की लागत से निर्मित इस मिसाइल में डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का उपयोग किया गया है। यह कैनिस्टराइज्ड सिस्टम के साथ आती है, जिससे इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ गई है। दिसंबर 2025 में इसके सफल परीक्षण के बाद इसे सेना में शामिल करने का रास्ता साफ हो गया है।
अस्त्रशक्ति 2023 का चमत्कार
17 दिसंबर 2023 को भारतीय वायु सेना ने 'अभ्यास अस्त्रशक्ति' के दौरान इतिहास रचा। भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया जिसने एक ही यूनिट से एक साथ चार अलग-अलग दिशाओं से आ रहे लक्ष्यों को एक साथ नष्ट करने की क्षमता प्रदर्शित की।
सेना में तैनाती और निर्यात
3 मार्च 2012 को आकाश आधिकारिक रूप से वायु सेना में शामिल हुई, जबकि भारतीय सेना ने इसे 5 मई 2015 को अपने बेड़े का हिस्सा बनाया। रक्षा निर्यात के मोर्चे पर भारत ने 2022 में अर्मेनिया के साथ ₹6,000 करोड़ का बड़ा सौदा किया। इसके अलावा ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, फिलीपींस समेत कई अन्य देश इस मिसाइल प्रणाली को खरीदने में गहरी रुचि दिखा रहे हैं।
Comments
0 comment