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6 घंटे पहले
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विचारों
लद्दाख की प्रसिद्ध प्राकृतिक धरोहरों को सहेजने की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। यहां की दम तोड़ती हुई ऐतिहासिक त्सो कार झील को बचाने के लिए प्रशासन ने एक अनोखा और बड़ा अभियान शुरू किया है। लद्दाख के उपराज्यपाल वीके सक्सेना इस पारिस्थितिकीय संकट को दूर करने के लिए खुद आगे आए हैं और उनके नेतृत्व में इस झील के कायाकल्प की योजना पर तेजी से काम शुरू कर दिया गया है। इससे पहले, लेह के पास स्थित सूखे इलाकों की सिंचाई के लिए स्टॉक ग्लेशियर के लगभग 90 मिलियन लीटर पानी को सफलतापूर्वक इगू-फे और चुचोट गांवों की नहरों तक पहुंचाया गया था। इस परियोजना की बड़ी सफलता के बाद अब प्रशासन ने एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए चांगथांग जिले की ओर रुख किया है।
ग्लेशियर के पानी से मिलेगी त्सो कार झील को नई जिंदगी
इस नई और महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत चांगथांग जिले में स्थित रूपशो खर्नक ग्लेशियर की जलधारा के पानी को मोड़कर त्सो कार झील तक लाया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया बेहद चुनौतीपूर्ण है क्योंकि त्सो कार झील लगभग 15,000 फीट की भारी ऊंचाई पर स्थित है। इस ऊंचाई पर पानी को मोड़ने और झील तक पहुंचाने की यह कोशिश पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
योजना के अनुसार, रूपशो खर्नक धारा से प्रतिदिन औसतन 132 क्यूसेक यानी लगभग 320 मिलियन लीटर ग्लेशियर का पानी, जो अब तक बिना किसी इस्तेमाल के बेकार बह जाता था, उसे इस सिमटती हुई झील की ओर मोड़ा जाएगा। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि वर्तमान में ग्लेशियर के पिघलने से निकलने वाला यह अमूल्य और शुद्ध पानी सीधे सिंधु नदी में मिलकर बेकार हो जाता है। इस पानी का सही इस्तेमाल करके अब त्सो कार झील को पुनर्जीवित किया जाएगा, जो पिछले दस वर्षों में बेहद खराब स्थिति में पहुंच चुकी है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में इस खूबसूरत झील का आकार लगभग 70 प्रतिशत तक कम हो चुका है।
प्रवासी पक्षियों का पुराना घर रही है यह झील
त्सो कार झील लद्दाख की सबसे महत्वपूर्ण और विहंगम ग्लेशियर झीलों में से एक मानी जाती है। भौगोलिक इतिहास पर नजर डालें तो यह झील कभी लगभग 11,000 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैली हुई थी। लेकिन बदलते मौसम चक्र, ग्लोबल वार्मिंग और पानी की कमी के कारण यह ऐतिहासिक झील अब सिमटकर केवल 3,200 एकड़ के बेहद छोटे दायरे में रह गई है।
झील के सूखने का सबसे बुरा असर यहां की जैव विविधता पर पड़ा है। यह जगह कभी दुनिया के कोने-कोने से आने वाले प्रवासी पक्षियों और विशेष रूप से दुर्लभ ब्लैक-नेक्ड क्रेन (काली गर्दन वाले सारस) का एक पसंदीदा और समृद्ध आशियाना हुआ करती थी। झील के लगातार सूखने के कारण अब यहां पक्षियों का आना बेहद कम हो गया है जिससे पूरे इलाके का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों को पूरी उम्मीद है कि बेकार बह रहे ग्लेशियर के पानी को यहां मोड़े जाने के बाद, त्सो कार झील महज एक साल के भीतर अपनी पुरानी चमक और रौनक वापस हासिल कर लेगी।
दुर्गम परिस्थितियों में अनूठी जल प्रबंधन पहल
भारत में इस स्तर की ऊंचाई और इतने कठिन भौगोलिक माहौल में किसी खत्म हो रही झील को बचाने का यह अपने आप में पहला और ऐतिहासिक प्रयास है। लद्दाख के इस इलाके में गर्मियों के मौसम में भी तापमान आमतौर पर 10 डिग्री सेल्सियस से कम ही रहता है, जबकि सर्दियों के महीनों में यहां की ठंड जानलेवा हो जाती है और पारा गिरकर माइनस 20 से माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे बर्फीले और बेहद ठंडे वातावरण में इस विशाल परियोजना को अमलीजामा पहनाना बेहद मुश्किल काम है।
जल प्रबंधन की इस अनोखी परियोजना का विचार उपराज्यपाल वीके सक्सेना के मन में तब आया जब उन्होंने इसी साल 10 अगस्त को पहली बार त्सो कार झील का दौरा किया था। अपनी इस यात्रा के दौरान जब उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों से बातचीत की, तो ग्रामीणों ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए उन्हें बताया कि यह खूबसूरत झील दिन-प्रतिदिन सिकुड़ती जा रही है और यहां आने वाले मेहमान पक्षियों की संख्या भी अब नगण्य हो गई है। ग्रामीणों की इस चिंता को गंभीरता से लेते हुए उपराज्यपाल ने तुरंत अधिकारियों के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की।
कैसे काम करेगी यह पूरी तकनीक और योजना?
इस विशाल और चुनौतीपूर्ण परियोजना का मुख्य उद्देश्य त्सो कार झील को फिर से पानी से सराबोर करना है। इसके लिए झील से करीब 11 किलोमीटर की दूरी पर और लगभग 18,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित रूपशो खर्नक धारा से ग्लेशियर के पिघले हुए पानी को, जो अब तक अनुपयोगी बह रहा था, विशेष चैनलों के माध्यम से झील की तरफ लाया जाएगा। गर्मी के दिनों में जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, तब इस धारा में पानी का बहाव अपने उच्चतम स्तर पर होता है, जो लगभग 132 क्यूसेक या 320 मिलियन लीटर प्रतिदिन रहने का अनुमान है।
इस पानी को सुरक्षित और नियंत्रित तरीके से झील तक पहुंचाने के लिए इंजीनियरों ने एक शानदार प्राकृतिक योजना बनाई है। ग्लेशियर से झील की ओर पानी बहने के रास्ते में तीन प्राकृतिक गड्ढे (डिप्रेशन) मौजूद हैं, जिनका उपयोग इस परियोजना में किया जाएगा:
- पहला प्राकृतिक गड्ढा: रूपशो खर्नक धारा से निकलने वाला पानी सबसे पहले करीब 270 एकड़ में फैले पहले बड़े प्राकृतिक गड्ढे में प्रवेश करेगा।
- दूसरा प्राकृतिक गड्ढा: पहले गड्ढे से पानी को आगे बढ़ाते हुए करीब 24 एकड़ में फैले दूसरे गड्ढे में भेजा जाएगा।
- तीसरा प्राकृतिक गड्ढा: अंत में, पानी को करीब 10 एकड़ के क्षेत्र वाले तीसरे गड्ढे में लाया जाएगा, जहां से इसे नियंत्रित रूप से आगे बढ़ाया जाएगा।
इन प्राकृतिक गड्ढों का उपयोग करने का मुख्य लाभ यह होगा कि पानी का बहाव नियंत्रित रहेगा और गाद नीचे बैठ जाएगी। पानी के स्तर को ठीक से बनाए रखने और इसके आगे के बहाव को नियंत्रित करने के लिए, इन तीनों गड्ढों के निकास द्वार (आउटलेट) पर RCC पाइप का उपयोग करके विशेष चेक डैम का निर्माण किया जा रहा है। इस अनूठी इंजीनियरिंग तकनीक से पानी का सुचारू प्रवाह सुनिश्चित होगा और त्सो कार झील को नया जीवन मिलेगा।
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