कॉफी पर कुरुक्षेत्र: यूपी की चुनावी बिसात पर योगी और अखिलेश की अलग-अलग चालें भारत एक घंटा पहले 2
उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ के अपने-अपने मुद्दे हैं, जहां एक तरफ जातीय समीकरणों पर जोर है, तो दूसरी तरफ कानून व्यवस्था और विकास मुख्य चेहरा बना हुआ है।

चुनावी समीकरणों का गणित और अखिलेश की रणनीति

उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में अखिलेश यादव पूरी तरह से पीडीए के इर्द-गिर्द अपनी राजनीति को बुने हुए नजर आ रहे हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के कथित सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर निशाना साधा है। अखिलेश के दावे के मुताबिक, पार्टी के भीतर बढ़ते दबाव और सहयोगी दलों को थामे रखने की जद्दोजहद में बीजेपी कई सीटों का बंटवारा करने जा रही है। इन आंकड़ों के अनुसार आरएलडी को 73 सीटें, सुभासपा को 39 सीटें, निषाद पार्टी को 31 सीटें और अपना दल को 19 सीटें देने की योजना है। अखिलेश की पूरी रणनीति पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए वर्ग को एकजुट करने पर केंद्रित है।

कानून व्यवस्था और सुरक्षा का योगी मॉडल

अखिलेश के जातीय समीकरणों के मुकाबले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पूरा जोर कानून व्यवस्था और गुंडाराज के खात्मे पर है। चुनावी चर्चाओं में यह बात स्पष्ट तौर पर उभरकर सामने आई है कि सुरक्षा का मुद्दा आम नागरिक के जीवन पर गहरा असर डालता है। राज्य में महिलाओं की सुरक्षा और रात के समय आवाजाही की स्थितियों को लेकर योगी सरकार अपनी उपलब्धियों को प्रमुखता से पेश कर रही है। पिछले दौर और मौजूदा समय की तुलना करते हुए यह तर्क दिया जा रहा है कि कानून का राज स्थापित करना ही जनता की पहली प्राथमिकता है।

माफिया और राजनीतिक संस्कृति पर सियासी घमासान

अखिलेश यादव के पिछले कार्यकाल को लेकर भी इस चुनावी चर्चा में तीखी बहस देखने को मिली। वर्ष 2012 का जिक्र करते हुए कहा गया कि उस समय जनता को उम्मीद थी कि समाजवादी पार्टी की कार्यशैली में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा और राजनीतिक संस्कृति बेहतर होगी। हालांकि, मुख्यमंत्री बनने के बाद माफिया तत्वों के प्रभाव पर लगाम लगाने में उतनी सफलता नहीं मिल सकी जितनी अपेक्षा की गई थी। इस मुद्दे को उठाकर विपक्षी नैरेटिव को काटने की कोशिश की जा रही है।

विकास की गति और निवेश का दावा

कानून व्यवस्था के साथ-साथ योगी सरकार अपनी विकास यात्रा को भी जनता के बीच ले जा रही है। चर्चा में राज्य के बुनियादी ढांचे के विकास पर खासा जोर दिया गया, जिसमें एक्सप्रेसवे, नए हाईवे और एयरपोर्ट्स का निर्माण शामिल है। इसके अलावा, एमएसएमई, स्टार्टअप और डिफेंस कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं को उत्तर प्रदेश की आर्थिक तरक्की का आधार बताया गया। राज्य में बड़ी इंडस्ट्रीज और एमएसएमई यूनिट्स की बढ़ती संख्या के जरिए रोजगार के दावों को भी चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

निष्कर्ष: दो अलग धाराओं का मुकाबला

कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश का मौजूदा चुनावी मुकाबला दो स्पष्ट विचारधाराओं के बीच है। एक तरफ अखिलेश यादव का जातीय ताना-बाना और पीडीए है, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ का कानून व्यवस्था, विकास और सुरक्षा का एजेंडा। यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश का मतदाता जातीय समीकरणों को तवज्जो देता है या फिर सुरक्षा और विकास के वादों पर मुहर लगाता है। इस चुनावी नैरेटिव की लड़ाई ही आने वाले समय की दिशा तय करेगी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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