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एक घंटा पहले
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भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र यानी प्राइवेट स्पेस सेक्टर इन दिनों एक नए और बेहद रोमांचक दौर से गुजर रहा है। अब तक देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों का नेतृत्व मुख्य रूप से सरकारी संस्था ISRO के कंधों पर रहा है, लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। देश की निजी कंपनियां भी इस क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं और बड़े तथा शक्तिशाली रॉकेट बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही हैं। इसी कड़ी में बेंगलुरु की एक प्रमुख निजी अंतरिक्ष कंपनी एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीस ने एक बेहद शक्तिशाली रॉकेट इंजन का अनावरण किया है। इस शक्तिशाली इंजन को ‘एवरेस्ट’ नाम दिया गया है, जो अपनी 800 kN क्लास की ताकत के साथ भारत के निजी क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। कंपनी का मुख्य लक्ष्य इस इंजन के जरिए दिसंबर 2028 में पहली बार अपनी ऑर्बिटल यानी कक्षीय उड़ान को अंजाम देना है। हालांकि, इस बड़ी महत्वाकांक्षा के बीच अभी कई महत्वपूर्ण तकनीकी पड़ाव पार करने बाकी हैं, जिनमें सबसे बड़ा पड़ाव इस इंजन का पहला हॉट-फायर टेस्ट होना है।
क्या है FFSC तकनीक और क्यों यह इतनी जटिल है?
रॉकेट विज्ञान की दुनिया में फुल फ्लो स्टेज कंबस्चन (FFSC) तकनीक को सबसे उन्नत और जटिल इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक माना जाता है। इस तकनीक की जटिलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया भर की गिने-चुने अंतरिक्ष संगठन और बड़ी कंपनियां ही इसे विकसित करने में सफल हो पाई हैं। सामान्य इंजनों की तुलना में FFSC इंजन बेहद अलग और कार्यकुशल होते हैं।
इस प्रणाली के तहत, ईंधन और ऑक्सीडाइजर दोनों को दहन कक्ष (कंबस्चन चेम्बर) में भेजने से पहले पूरी तरह से गैस के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया के कई बड़े फायदे होते हैं:
- बेहतर ईंधन दक्षता: ईंधन और ऑक्सीडाइजर के पूरी तरह गैस में बदलने से दहन प्रक्रिया अधिक कुशल हो जाती है, जिससे रॉकेट को अधिक ऊर्जा मिलती है।
- तापमान नियंत्रण: यह तकनीक टर्बोमशीनरी के भीतर के अत्यधिक तापमान को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने में मदद करती है, जिससे इंजन के फटने या खराब होने का खतरा कम हो जाता है।
- पुनः प्रयोज्यता (रीयूजेबिलिटी): चूंकि यह इंजन अधिक स्थिर और नियंत्रित तरीके से काम करता है, इसलिए यह भविष्य के रीयूजेबल रॉकेटों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। ऐसे रॉकेट जिन्हें अंतरिक्ष में भेजने के बाद सुरक्षित रूप से वापस धरती पर लैंड कराया जा सके और फिर से इस्तेमाल किया जा सके।
‘एवरेस्ट’ इंजन की ताकत और इसकी मुख्य तकनीकी विशेषताएं
एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीस द्वारा विकसित किया जा रहा ‘एवरेस्ट’ इंजन कई ऐसे पैमानों पर तैयार किया जा रहा है जो इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाते हैं। कंपनी ने इस इंजन के डिजाइन और कार्यप्रणाली को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं:
प्रोपेलेंट और ईंधन: इस इंजन में ईंधन के तौर पर लिक्विड ऑक्सीजन (O2) और मीथेन के मिश्रण का उपयोग किया जाएगा। यह संयोजन पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ रीयूजेबल रॉकेटों के लिए बेहद प्रभावी माना जाता है।
थ्रस्ट क्षमता: इसका डिजाइन थ्रस्ट करीब 800 kN क्लास का है, जो इसे भारत के निजी क्षेत्र में अब तक का सबसे शक्तिशाली इंजन बनाता है।
स्पेसिफिक इंपल्स: कंपनी का लक्ष्य इस इंजन के जरिए लगभग 340 सेकंड का स्पेसिफिक इंपल्स हासिल करना है, जो इसकी उत्कृष्ट दक्षता को प्रदर्शित करता है।
थ्रॉटलिंग क्षमता: ‘एवरेस्ट’ इंजन को 50 फीसदी से लेकर 110 फीसदी तक थ्रॉटल करने की क्षमता के साथ डिजाइन किया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि उड़ान के दौरान जरूरत के हिसाब से इंजन की शक्ति को आधा या फिर उसकी सामान्य क्षमता से अधिक किया जा सकता है। रीयूजेबल रॉकेटों के लिए यह क्षमता बेहद जीवनदायिनी होती है, क्योंकि जब रॉकेट वापस धरती पर लैंड कर रहा होता है, तो उसकी गति को नियंत्रित करने के लिए इंजन के थ्रस्ट को बहुत ही सटीक तरीके से कम या ज्यादा करना पड़ता है।
वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग में भारत की धाक जमाने की तैयारी
पूरी दुनिया में आज भी हेवी और मीडियम-लिफ्ट रॉकेट लॉन्च करने की क्षमता केवल कुछ ही देशों और उनकी एजेंसियों के पास सीमित है। ऐसे समय में जब उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की मांग लगातार बढ़ रही है, भारत के पास अपनी कम लागत और बेहतरीन तकनीकी कौशल के दम पर दुनिया का एक प्रमुख लॉन्च हब बनने का शानदार मौका है।
एस्ट्रोबेस के CEO नीरज खंडेलवाल ने इस उपलब्धि पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कंपनी दुनिया की उन चुनिंदा कमर्शियल कंपनियों में शामिल हो गई है, जिसने इस स्तर के अत्यंत जटिल FFSC इंजन को खुद डिजाइन, मैन्युफैक्चर और इंटीग्रेट करने की क्षमता हासिल की है। उनके अनुसार, वैश्विक अंतरिक्ष लॉन्च बाजार अभी बहुत सीमित देशों और कंपनियों के हाथों में केंद्रित है। भारत के पास अपने विशाल टैलेंट पूल और बेहतरीन तकनीकी आधार का उपयोग करते हुए इस वैश्विक बाजार में एक मजबूत और विश्वसनीय वैकल्पिक केंद्र के रूप में उभरने का सुनहरा अवसर है। कंपनी की योजना केवल इंजन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इंजन निर्माण से लेकर पूरे रॉकेट के विकास, उसकी टेस्टिंग और लॉन्चिंग की पूरी प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में रखकर एक आत्मनिर्भर लॉन्च इकोसिस्टम तैयार करना चाहती है।
स्वदेशी तकनीक पर जोर: 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा भारत में निर्मित
‘एवरेस्ट’ इंजन की एक और सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से देश के भीतर ही तैयार किया जा रहा है। एस्ट्रोबेस का दावा है कि इस अत्याधुनिक इंजन का 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा भारत में ही डिजाइन, विकसित और निर्मित किया गया है।
कंपनी के अधिकारियों के अनुसार, इंजन का संपूर्ण मूल डिजाइन इन-हाउस यानी कंपनी के अपने इंजीनियरों द्वारा तैयार किया गया है और इसका अधिकांश विनिर्माण बेंगलुरु की अत्याधुनिक सुविधाओं में किया जा रहा है। हालांकि, कुछ बेहद जटिल सेंसर और विशेष कंपोनेंट्स ऐसे हैं जिन्हें अभी विदेशों से आयात करना पड़ता है, क्योंकि भारत में उनकी उपलब्धता फिलहाल काफी सीमित है। लेकिन कंपनी का इरादा साफ है कि जैसे-जैसे देश के भीतर सहायक उद्योगों और घरेलू सप्लाई चेन का विकास होगा, वह आयात पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह से समाप्त कर देगी और शत-प्रतिशत घरेलू तकनीक का इस्तेमाल करेगी। यह आत्मनिर्भरता भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग को वैश्विक बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगी।
सालाना 100 टन से 1,000 टन पेलोड अंतरिक्ष में भेजने का महा-लक्ष्य
एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीस ने अपने भविष्य के व्यावसायिक संचालन को लेकर बेहद महत्वाकांक्षी और दीर्घकालिक योजनाएं तैयार की हैं। कंपनी का लक्ष्य केवल एक रॉकेट उड़ाना नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष परिवहन क्षेत्र में एक बड़ा खिलाड़ी बनना है।
कंपनी की योजना के अनुसार, शुरुआती चरण में वे हर साल लगभग 100 टन पेलोड को अंतरिक्ष की कक्षा (ऑर्बिट) तक सुरक्षित और सस्ते तरीके से पहुंचाने की क्षमता विकसित करना चाहते हैं। इसके बाद, जैसे-जैसे उनकी तकनीक और अधिक परिपक्व होगी और उनके रीयूजेबल रॉकेटों की संख्या बढ़ेगी, इस क्षमता को सालाना 1,000 टन से ज्यादा पेलोड तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। वैश्विक बाजार में उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में अभूतपूर्व उछाल आया है, लेकिन लॉन्चरों की कमी के कारण कई कंपनियों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। एस्ट्रोबेस इसी कमी को पूरा करके एक भरोसेमंद और सस्ती सेवा देना चाहती है।
असली परीक्षा अभी बाकी: चुनौतियों भरा है आगे का सफर
भले ही ‘एवरेस्ट’ इंजन के अनावरण ने भारतीय अंतरिक्ष उद्योग में एक नया उत्साह भर दिया है और कंपनी ने अपनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं को दुनिया के सामने रख दिया है, लेकिन इसे पूरी तरह सफल रॉकेट इंजन घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में किसी भी डिजाइन को हकीकत में बदलने और उसे अंतरिक्ष में भेजने के बीच का सफर बेहद कठिन और जोखिमों से भरा होता है।
कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस इंजन का पहला हॉट-फायर टेस्ट आयोजित करना है। इस टेस्ट के दौरान इंजन को जमीन पर एक टेस्ट स्टैंड पर बांधकर पूरी क्षमता के साथ चलाया जाता है, जिससे यह पता चलता है कि वास्तविक उड़ान के दौरान यह अत्यधिक दबाव और तापमान को सहन कर पाएगा या नहीं। इस महत्वपूर्ण पड़ाव के बाद भी कंपनी को कई अन्य चरणों से गुजरना होगा:
- लगातार टेस्ट फायरिंग: इंजन की विश्वसनीयता की जांच करने के लिए उसे बार-बार और लंबे समय तक चलाकर परखा जाएगा।
- प्रदर्शन सत्यापन और बदलाव: शुरुआती परीक्षणों से मिलने वाले डेटा के आधार पर डिजाइन में आवश्यक सुधार और बदलाव किए जाएंगे।
- क्वालिफिकेशन टेस्ट: इंजन को हर तरह की कठिन परिस्थितियों में काम करने के योग्य प्रमाणित करने के लिए कड़े परीक्षणों से गुजरना होगा।
- रॉकेट इंटीग्रेशन: अंत में, जब इंजन पूरी तरह से सुरक्षित घोषित हो जाएगा, तब उसे कंपनी के मीडियम-लिफ्ट लॉन्च व्हीकल के साथ एकीकृत किया जाएगा।
इसलिए, दिसंबर 2028 में पहली बार कक्षा तक पहुंचने का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य कंपनी ने तय किया है, उसकी सफलता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि ‘एवरेस्ट’ इंजन इन सभी परीक्षणों की कसौटी पर कितना खरा उतरता है। यदि बेंगलुरु की यह कंपनी इन सभी कठिन चुनौतियों को पार करने में सफल हो जाती है, तो यह केवल एक कंपनी की जीत नहीं होगी, बल्कि भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग सीधे तौर पर वैश्विक स्तर पर स्पेस-एक्स जैसी दिग्गज कंपनियों को टक्कर देने की स्थिति में खड़ा हो जाएगा।
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