पाकिस्तान
48 मिनट पहले
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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर भारत का कानूनी अधिकार
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्दा दशकों से चर्चा का केंद्र रहा है, लेकिन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK पर भारत के दावे का सबसे बड़ा और संवैधानिक प्रमाण जम्मू-कश्मीर विधानसभा की वे 24 सीटें हैं, जो आज भी खाली रखी जाती हैं। इन सीटों को आरक्षित रखने के पीछे एक गहरा राजनीतिक और ऐतिहासिक संदेश है, जो यह दर्शाता है कि भारत सरकार और यहां के लोग इसे हमेशा अपना ही हिस्सा मानते हैं।
इतिहास के पन्नों से: विलय और संघर्ष
वर्ष 1947 में जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया, तब वहां के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इस कानूनी प्रक्रिया के बाद से ही पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला क्षेत्र भी शामिल है, संवैधानिक और कानूनी रूप से भारत का अटूट हिस्सा बन गया। इसी आधार पर, भारतीय संसद ने 1994 में एक स्पष्ट प्रस्ताव पारित किया था जिसमें PoK के भारत का हिस्सा होने की बात को दोहराया गया था।
सीटों का महत्व और परिसीमन
हाल के वर्षों में जब जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बदलाव हुए, तब 2022 में हुए परिसीमन के दौरान भी इन 24 सीटों को खाली रखा गया। भारत सरकार का यह कदम मात्र एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संदेश है। इस निर्णय के जरिए भारत ने दुनिया को यह बता दिया है कि PoK की 'घर वापसी' न केवल तय है, बल्कि इस पर भारत का दावा भी पूरी तरह से बरकरार है।
जनभावना और बदलती परिस्थितियां
आज जब PoK के भीतर से पाकिस्तान के खिलाफ विरोध की आवाजें उठ रही हैं, तब ये 24 रिक्त सीटें 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक इच्छाशक्ति और संकल्प को प्रदर्शित करती हैं। इन सीटों को जानबूझकर आरक्षित और खाली छोड़े जाने का अर्थ यह है कि भारत की संसद में इन क्षेत्रों के प्रतिनिधियों के लिए जगह आज भी सुरक्षित है। यह स्पष्ट करता है कि PoK न सिर्फ भारत का था, बल्कि वह आज भी भारत का है और आने वाले समय में भी भारत का ही रहेगा।
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