शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले ड्रैगन पर दबाव, भारत ने सीमा विवाद सुलझाने के लिए थमाए 3 कड़े टास्क राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 2
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मद्देनजर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के संभावित भारत दौरे से पहले सीमा विवाद पर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भारत ने एलएसी पर शांति बहाली और तकनीकी पारदर्शिता के लिए चीन के सामने तीन सख्त शर्तें रखी हैं।

चीन के साथ 36वें दौर की अहम बैठक

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगामी भारत दौरे और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उनकी संभावित भागीदारी को लेकर नई दिल्ली और बीजिंग के बीच कूटनीतिक हलचल काफी बढ़ गई है। करीब सात वर्षों के लंबे अंतराल के बाद होने वाली इस यात्रा से पहले, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के उद्देश्य से 'वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन' (WMCC) की 36वें दौर की उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह बातचीत बेहद स्पष्ट और खरी-खरी रही है। भारत ने अपने पड़ोसी देश के सामने तीन कड़े टास्क रखे हैं, जिन्हें पूरा करना शी जिनपिंग के दौरे की सफलता के लिए अनिवार्य माना जा रहा है। भारत का रुख साफ है कि सरहद पर जब तक शांति और स्थिरता का वातावरण नहीं बनता, तब तक द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य होने की उम्मीद करना व्यर्थ है।

भारत द्वारा चीन को दिए गए 3 प्रमुख टास्क

WMCC की इस बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव (पूर्व एशिया) सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी पक्ष का नेतृत्व उनके विदेश मंत्रालय के महानिदेशक हाऊ यानकी ने किया। भारत ने किसी भी तरह की गोलमोल बातचीत के बजाय चीन के सामने तीन महत्वपूर्ण कार्य रखे हैं जो सीधे तौर पर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े हुए हैं:

  • एलएसी पर शांति और नो-उकसावा नीति: भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव को कम करना प्राथमिकता है। चीन को कड़ी हिदायत दी गई है कि वह किसी भी प्रकार की उकसावे वाली गतिविधियों से पूरी तरह परहेज करे। दोनों पक्षों के बीच इस बात पर जोर दिया गया कि शांति ही भविष्य के संबंधों की आधारशिला हो सकती है।
  • नदियों के पानी का तकनीकी डेटा साझा करना: भारत ने ट्रांस-बॉर्डर नदियों से जुड़े एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म की बैठक को प्राथमिकता देने का आह्वान किया है। विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी इलाकों में चीन द्वारा निर्मित की जा रही जल परियोजनाओं का पूर्ण तकनीकी डेटा पारदर्शी तरीके से भारत के साथ साझा करना होगा, ताकि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बाढ़ और पानी की किल्लत जैसी आपदाओं से बचाया जा सके।
  • पारदर्शी संचार तंत्र का उपयोग: दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई है कि भविष्य में किसी भी गलतफहमी या गलत आकलन से बचने के लिए मौजूदा राजनयिक और सैन्य चैनलों का बिना किसी बाधा के उपयोग किया जाएगा। स्थानीय कमांडर स्तर की वार्ता को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर जोर दिया गया है।

अजीत डोभाल और वांग यी की वार्ता से उपजा रोडमैप

WMCC की यह हालिया बैठक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच पिछले साल हुई 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता का ही विस्तार है। अगस्त 2025 की उस महत्वपूर्ण बैठक में दोनों देशों ने सीमा विवाद के समाधान के लिए तीन स्तरीय रोडमैप तैयार किया था। भारत अब उसी योजना पर मजबूती से अमल चाहता है। इस रोडमैप में विवादित क्षेत्रों का सीमांकन करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित करना, बॉर्डर मैनेजमेंट के लिए एक समर्पित वर्किंग ग्रुप बनाना और पश्चिमी, पूर्वी तथा मध्य सेक्टर में सेना के जनरलों के बीच संचार का नया ढांचा विकसित करना शामिल है।

गलवान के बाद कितना बदला है भारत-चीन का समीकरण?

साल 2020 में गलवान घाटी की दुर्भाग्यपूर्ण झड़प के बाद से भारत और चीन के संबंध 1962 के युद्ध के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। उस हिंसक घटना में भारत ने अपने 20 वीर जवानों को खो दिया था, जिसके बाद लद्दाख सीमा पर लंबे समय तक तनाव का माहौल बना रहा। हालांकि अक्टूबर 2024 में दोनों देश विवादित क्षेत्रों से सेना पीछे हटाने पर सहमत हुए, जिसके बाद रूस में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच ऐतिहासिक मुलाकात संभव हो पाई। इसके बावजूद, यह कड़वा सच है कि अविश्वास की गहरी खाई अभी भी बनी हुई है और सीमा विवाद के मूल कारण अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

अविश्वास के पीछे चीन की दो बड़ी गलतियां

भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार की राह में चीन की दो बड़ी गलतियां सबसे बड़ी बाधा बनी हुई हैं। पहली, चीन द्वारा पाकिस्तान को लगातार दी जा रही सैन्य और खुफिया सहायता है। भारत के खिलाफ 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पाकिस्तान को रियल-टाइम इंटेलिजेंस उपलब्ध कराने की खबरों ने दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट बढ़ाई है। दूसरी, चीन का भारतीय भूभाग पर अवैध कब्जा है। चीन आज भी अक्साई चिन के 43,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र पर अवैध रूप से काबिज है और लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों पर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास करता रहता है, जो भारत के लिए पूरी तरह अस्वीकार्य है।

सीमा विवाद: चीन की रणनीतिक मजबूरी

चीन मामलों की विशेषज्ञ अनुष्का सक्सेना का मानना है कि एलएसी विवाद का समाधान कोई तात्कालिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक लंबी कूटनीतिक मैराथन है। सक्सेना के अनुसार, चीन जानबूझकर सीमा विवाद को पूरी तरह हल नहीं करना चाहता, क्योंकि वह इस तनातनी को एक दबाव बनाने वाले उपकरण के रूप में इस्तेमाल करता है। चीन बखूबी जानता है कि सीमा का स्थायी समाधान भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसलिए वह रियायतें देने के बजाय हमेशा भारत से अधिक लाभ उठाने की फिराक में रहता है। ऐसे में शी जिनपिंग की प्रस्तावित भारत यात्रा के दौरान सुरक्षा और कूटनीति के मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाना भारत की मजबूरी और आवश्यकता दोनों बन गया है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह चीन की किसी भी कूटनीतिक चाल में फंसने वाला नहीं है और सीमा पर पूर्ण शांति के बिना सामान्य रिश्तों की बहाली संभव नहीं है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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