पशु परीक्षण नियमों में बदलाव को लेकर उठा विवाद, विशेषज्ञ बोले- शोध की विश्वसनीयता पर पड़ेगा बुरा असर भारत एक घंटा पहले 9
केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए पशु प्रयोग से जुड़े नए ड्राफ्ट नियमों का पशु अधिकार संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। जानकारों का कहना है कि ये नियम न केवल जानवरों के लिए घातक होंगे बल्कि आधुनिक वैज्ञानिक शोध की प्रगति को भी पीछे धकेल देंगे।

पशु क्रूरता निवारण नियमों में बदलाव पर उठ रहे सवाल

भारत सरकार द्वारा जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों को लेकर पेश किए गए नए ड्राफ्ट नियमों के कारण विवाद गहरा गया है। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और संगठनों ने चेतावनी दी है कि प्रस्तावित 'पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला जानवरों के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण और पर्यवेक्षण) नियम, 2026' के लागू होने से न केवल प्रयोगशालाओं में जानवरों के प्रति क्रूरता बढ़ेगी, बल्कि शोध की गुणवत्ता भी दांव पर लग सकती है। इन नियमों का उद्देश्य 1968 और 1998 के पुराने मानकों को बदलना है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि यह बदलाव सुरक्षा के मौजूदा घेरे को पूरी तरह खत्म कर देगा। सरकार ने इस ड्राफ्ट के संदर्भ में जनता से 5 नवंबर तक आपत्तियां और सुझाव मांगे हैं, जबकि प्रशासन का दावा है कि ये नियम वैज्ञानिक अनुसंधान में तेजी लाने में मदद करेंगे।

खुले बाजार से खरीद और जेनेटिक अनिश्चितता की समस्या

इस मामले पर 'ह्यूमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स' की सीनियर प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. सूरत पर्वतम ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि नए मसौदे में प्रयोगशालाओं को मिलने वाली छूट बेहद खतरनाक है। यदि शोधकर्ताओं को अधिकृत स्रोतों से जानवर नहीं मिलते हैं, तो उन्हें खुले बाजार या अपंजीकृत प्रजनकों से पशु खरीदने की अनुमति दी जा रही है।

डॉ. सूरत पर्वतम ने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए प्रयोगशालाओं में पाले गए जानवरों की जेनेटिक बैकग्राउंड और मेडिकल हिस्ट्री का होना अनिवार्य होता है। एकरूपता और वैज्ञानिक सटीकता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है। यदि जानवरों को खुले बाजारों या आवारा पशुओं के बीच से उठाकर प्रयोगों में शामिल किया जाएगा, तो उनकी स्वास्थ्य स्थिति का पता लगाना असंभव होगा। इससे शोध के परिणाम पूरी तरह अविश्वसनीय हो जाएंगे, क्योंकि उन जानवरों में मौजूद बीमारियां या आनुवंशिक कमियां परीक्षणों को गलत दिशा दे सकती हैं।

क्या वैकल्पिक शोध विधियों की अनदेखी की जा रही है?

नए मसौदे में एक और बड़ा बदलाव जो चिंता का विषय बना है, वह है वैकल्पिक परीक्षण विधियों का अनिवार्य न होना। पुराने नियमों के तहत, शोधकर्ताओं के लिए यह बाध्यकारी था कि वे जानवरों का इस्तेमाल करने से पहले गैर-पशु आधारित विकल्पों को आजमाएं। यदि वे इन विकल्पों का उपयोग नहीं करते थे, तो उन्हें वैज्ञानिक रूप से इसका ठोस कारण बताना पड़ता था।

डॉ. सूरत का आरोप है कि नए ड्राफ्ट में इस जवाबदेही को पूरी तरह से हटा दिया गया है। उन्होंने कहा कि पुराने नियमों का ढांचा स्पष्ट था और वह जानवरों पर होने वाली पीड़ा को कम करने के लिए था, लेकिन प्रस्तावित बदलाव इस दिशा में बड़ी गिरावट को दर्शाते हैं। बिना स्पष्ट कारण बताए जानवरों का चयन करने की छूट देना शोध के नैतिक मानकों के खिलाफ है।

आधुनिक शोध और भारत की वैश्विक छवि

वर्तमान समय में वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय ऑर्गेनॉइड्स और ऑर्गन-ऑन-चिप जैसी तकनीकों को अपना रहा है, जो इंसानी जैविक प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से समझने में सक्षम हैं। डॉ. सूरत के अनुसार, 2026 का प्रस्तावित मसौदा भारत की इन आधुनिक उपलब्धियों और वैज्ञानिक प्रगति को पीछे ले जाने वाला है। यदि हम पुरानी और क्रूर विधियों की ओर वापस लौटते हैं, तो यह आधुनिक शोध के क्षेत्र में भारत की साख को प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के नाम पर पशु सुरक्षा के साथ समझौता न किया जाए। अनुसंधान की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब उसमें नैतिकता और वैज्ञानिक सार्थकता का सही संतुलन हो।

महत्वपूर्ण सूचना: यदि आप प्रस्तावित नियमों के संबंध में अपना पक्ष रखना चाहते हैं, तो आप अपने सुझाव या आपत्तियां आधिकारिक ईमेल आईडी cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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