अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजे क्या बदलेंगे डोनाल्ड ट्रंप की भारत नीति? शशि थरूर ने दिया स्पष्ट जवाब
राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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अमेरिकी राजनीति में बड़ा उलटफेर
अमेरिका में संपन्न हुए मिडटर्म चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीतिक तस्वीर बदल दी है। रिपब्लिकन पार्टी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह चुनाव एक बड़े झटके के समान है। डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया है, जो ट्रंप प्रशासन के लिए आने वाले समय में चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। जानकारों का मानना है कि ईरान के साथ तनावपूर्ण स्थिति, वैश्विक स्तर पर बढ़ती तेल की कीमतें और घरेलू स्तर पर महंगाई जैसे मुद्दों ने आम जनता के बीच ट्रंप सरकार के खिलाफ नाराजगी पैदा की है। इस चुनाव परिणाम को राष्ट्रपति की नीतियों के खिलाफ एक जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा है।
भारत-अमेरिका रिश्तों पर क्या पड़ेगा असर?
जैसे ही चुनाव के नतीजे सामने आए, भारत में यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या वॉशिंगटन में सत्ता का यह नया समीकरण नई दिल्ली के साथ रिश्तों को प्रभावित करेगा। क्या अब डोनाल्ड ट्रंप भारत पर टैरिफ लगाने या व्यापारिक समझौतों को लेकर पहले जैसा कड़ा रुख अपना पाएंगे? इन सवालों ने नीति निर्माताओं और कूटनीतिज्ञों के बीच बहस छेड़ दी है। इस मामले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने एक बेबाक राय रखी है। थरूर ने स्पष्ट किया कि हालांकि संसद में डेमोक्रेट्स का दबदबा बढ़ा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत की विदेश नीति से जुड़ी चुनौतियों का अंत हो गया है।
राष्ट्रपति के पास अब भी व्यापक अधिकार
शशि थरूर ने एक मीडिया संस्थान से बातचीत के दौरान कहा कि भारत को अब भी उसी डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपनी कूटनीतिक बातचीत जारी रखनी होगी, जिन्हें वह पहले से जानता है। उनके अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति को विदेश नीति के मामलों में काफी व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं। भले ही डेमोक्रेट्स का संसद पर कब्जा हो गया हो, लेकिन इससे ट्रंप के लिए टैरिफ लगाने या प्रतिबंधों की धमकी देने के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हो जाएंगे। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति की निर्णय लेने की क्षमता पर संसद का अंकुश कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रह सकता है।
संसद की बाधाएं और कूटनीतिक चुनौतियां
थरूर के विश्लेषण के अनुसार, ट्रंप प्रशासन को अब निश्चित रूप से कुछ घरेलू और प्रशासनिक मोर्चों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। विशेष रूप से विदेश से जुड़े खर्चों के लिए बजट पास कराने और महत्वपूर्ण राजदूतों की नियुक्ति करने में उन्हें डेमोक्रेट्स से कड़ी टक्कर मिल सकती है। भारत के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यापार, शुल्क और टैरिफ जैसे विषय पहले से ही दोनों देशों के संबंधों के केंद्र में हैं। क्या डेमोक्रेट्स के दोनों सदनों में आने के बाद ट्रंप के फैसलों की कड़ी निगरानी होगी? थरूर ने इस संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि राष्ट्रपति के पास अपने दम पर टैरिफ तय करने के अन्य कानूनी रास्ते भी मौजूद हैं।
भारत के लिए शशि थरूर की सलाह
थरूर ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों और अन्य कानूनी प्रावधानों का सहारा लेकर राष्ट्रपति अब भी अपनी मनमर्जी के टैरिफ लागू करने की स्थिति में रह सकते हैं। उन्होंने भारत को सलाह देते हुए कहा कि नई दिल्ली को यह वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिए कि विदेश नीति के मामले में ट्रंप काफी हद तक स्वतंत्र बने रहेंगे। इसलिए, भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों को और अधिक परिपक्वता के साथ आगे बढ़ाना होगा और ट्रंप के उसी मौजूदा रुख को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी, जिसका अनुभव भारत को अब तक मिला है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा
अमेरिका की इस चुनावी हार को भारत में भी कई तरह से देखा जा रहा है। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल इसे एक उदाहरण के तौर पर पेश कर रहे हैं कि लोकतंत्र में कितना भी प्रभावशाली नेता क्यों न हो, अंततः उसे जनता के कठिन सवालों का सामना करना ही पड़ता है। हालांकि, थरूर ने इन अमेरिकी नतीजों की तुलना सीधे तौर पर भारत की राजनीतिक परिस्थितियों से करने से परहेज किया। उनका ध्यान केवल इस बात पर केंद्रित रहा कि वॉशिंगटन के बदल रहे राजनीतिक समीकरणों का भारत की कूटनीति पर व्यावहारिक असर क्या होगा। संक्षेप में कहें तो उनका संदेश बिल्कुल साफ है, सत्ता का संतुलन बदल सकता है लेकिन भारत को अपनी कूटनीतिक निरंतरता बनाए रखनी होगी।
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