क्या रूस-यूक्रेन की तरह ही अमेरिका-ईरान का संघर्ष भी बन जाएगा एक अंतहीन जंग? एक्सपर्ट ने खोलकर रखे इसके हर पहलू भारत 2 महीने पहले 65
रूस-यूक्रेन के तर्ज पर क्या अमेरिका और ईरान का विवाद भी सालों तक चलने वाला संकट बन गया है? डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों, परमाणु धमकी के मायने और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके गंभीर प्रभावों को जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव ने बारीकी से समझाया है।

रूस-यूक्रेन के बाद एक नया वैश्विक गतिरोध

जिस तरह से फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच जंग की शुरुआत हुई थी, तब दुनियाभर के विश्लेषकों का मानना था कि यह संघर्ष बहुत कम समय में समाप्त हो जाएगा। हालांकि, आज सालों बीत जाने के बाद भी इस युद्ध का कोई निर्णायक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इस संघर्ष ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को हिलाकर रख दिया है, बल्कि पूरी दुनिया को एक अनिश्चित और लंबे जियोपॉलिटिकल डेडलॉक में डाल दिया है। ठीक उसी तरह की आहट अब मध्य-पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के रूप में महसूस की जा रही है। क्या यह नया संकट भी एक अंतहीन युद्ध बनने की ओर अग्रसर है? इसी जटिल समीकरण को समझने के लिए हमने जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव से बातचीत की, जिसमें उन्होंने ट्रंप की रणनीति, हॉर्मुज स्ट्रेट के महत्व, और इस पूरे खेल में रूस, चीन व भारत की भूमिका पर विस्तार से रोशनी डाली है।

डोनाल्ड ट्रंप की धमकी का वास्तविक अर्थ

डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर अमेरिका के प्रति नरमी नहीं बरती गई, तो ईरान का अस्तित्व मिटा दिया जाएगा। इस पर रोबिंदर सचदेव का कहना है कि यह बयान मुख्य रूप से एक मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी साइकोलॉजिकल वॉरफेयर का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सिर्फ ईरान को सीधे तौर पर डराना नहीं है, बल्कि आसपास के अरब देशों को यह संकेत देना है कि अमेरिका अब किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है। परमाणु हमले की संभावना पर सचदेव ने स्पष्ट किया कि जियोपॉलिटिक्स में पॉसिबिलिटी और प्रोबेबिलिटी अलग-अलग चीजें हैं। हालांकि तकनीकी रूप से परमाणु हमला पॉसिबल हो सकता है, लेकिन वर्तमान में इसकी प्रोबेबिलिटी शून्य के करीब है।

TACO थ्योरी और ट्रंप की कार्यशैली

डोनाल्ड ट्रंप की पर्सनैलिटी को वॉल स्ट्रीट में TACO टर्म से परिभाषित किया जाता है। इसके दो मतलब हैं। पहला, 'Trump Always Chickens Out', जिसका अर्थ है कि 'गेम ऑफ चिकन' में ट्रंप अंतिम क्षणों में पीछे हट जाते हैं। दूसरा, 'Trump Always Carries On', जिसका मतलब है कि जिन मुद्दों को वे ठान लेते हैं, जैसे कि टैरिफ लगाना, उनमें वे पूरी सख्ती जारी रखते हैं। वे जानबूझकर खुद को एक अनिश्चित स्थिति में रखते हैं ताकि विरोधी उनके खिलाफ कोई ठोस प्लान न बना सकें। यह उनके 1970 और 80 के दशक के न्यूयॉर्क रियल एस्टेट बिजनेस का पुराना तरीका है, जिसमें वे ब्लफिंग और शो-ऑफ का खूब सहारा लेते थे।

बदलती विश्व व्यवस्था का नया मैट्रिक्स

कोविड-19 के बाद से 100 साल पुरानी वर्ल्ड ऑर्डर टूट रही है और एक नया वर्ल्ड मैट्रिक्स आकार ले रहा है। आज हर राष्ट्र अपने लिए नए पार्टनर और सुरक्षित सप्लाई चेन खोजने की कोशिश में है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस भ्रम को तोड़ दिया है कि एक बड़ी महाशक्ति किसी छोटे देश को चंद हफ्तों में घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती है। यही स्थिति मिडिल ईस्ट में भी दिख रही है। इजरायल ने दावा किया था कि वह गाजा से हमास का नामोनिशान मिटा देगा, लेकिन 400 स्क्वायर किलोमीटर के छोटे इलाके को भी वह पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाया है। अमेरिका-ईरान के बीच का संघर्ष भी एक अंतहीन दौर में प्रवेश कर चुका है।

हॉर्मुज स्ट्रेट का हथियार और पीस-फायर

ईरान के पास एक नया सुपर वेपन है, जिसे एक्सपर्ट हॉर्मुजी पंजा कहते हैं। जब ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट को ब्लॉक किया, तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। फिलहाल कोई भी संभावित सीजफायर स्पष्ट शर्तों वाला नहीं होगा। यह सीजफायर न होकर एक 'पीस-फायर' होगा, जहां शांति की बातचीत के बीच छिटपुट हमले और तनाव जारी रहेंगे। ईरान की मुख्य मांग है कि लेबनान और हिजबुल्लाह पर इजरायल के हमले रुकने चाहिए। युद्ध में किसी पक्ष के पूरी तरह खत्म होने के बजाय, दोनों पक्ष एक डायनेमिक इक्विलिब्रियम की तलाश में हैं।

परमाणु विकल्प और मैडमैन थ्योरी

रिचर्ड निक्सन की तर्ज पर डोनाल्ड ट्रंप भी 'मैडमैन थ्योरी' का उपयोग कर रहे हैं। इसका सिद्धांत है कि दुश्मन को यह यकीन दिला दो कि आप पूरी तरह पागल हो चुके हैं और कुछ भी कर सकते हैं। हालांकि इजरायल के भीतर एक एक्सट्रीम धड़ा यह मानता है कि ईरान को खत्म करने के लिए तेहरान पर परमाणु हमला किया जाना चाहिए, लेकिन यह विचार मुख्यधारा में नहीं है। जियोपॉलिटिक्स में मान्यताएं तेजी से बदलती हैं, इसलिए इसे पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अभी इसकी संभावना बहुत कम है।

तेल की सप्लाई और वैश्विक आर्थिक नुकसान

हॉर्मुज स्ट्रेट का बंद होना केवल एक सैन्य मुद्दा नहीं है, बल्कि इंश्योरेंस कंपनियों के लिए बड़ा जोखिम है। अगर हल्का सा भी खतरा बढ़ता है, तो इंश्योरेंस कंपनियां तेल टैंकरों का बीमा करने से मना कर देंगी। इससे ग्लोबल इकॉनमी पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ेंगे:

  • गल्फ देशों के लिए नुकसान: दुबई, कतर और बहरीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्था जो पर्यटन और फाइनेंस पर आधारित है, वहां से बड़े निवेशक अपना पैसा निकाल लेंगे।
  • क्रूड ऑयल और पेट्रोकेमिकल्स: नाफ्था और पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल दवाइयों से लेकर मोबाइल पार्ट्स तक में होता है, जिससे पूरी मैन्युफैक्चरिंग चेन प्रभावित होगी।
  • ग्लोबल रिजर्व: पिछले चार महीनों में दुनिया ने अपने ऑयल रिजर्व का भरपूर इस्तेमाल किया है, जो अब निचले स्तर पर हैं। किसी भी नाकेबंदी से पूरी दुनिया की फूड सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।

रूस और चीन का गेम प्लान

इस पूरे संकट का सबसे बड़ा लाभ रूस और चीन को मिल रहा है। अमेरिका के संसाधन, जैसे पैट्रियट मिसाइलें इजरायल और यूक्रेन में खर्च होने के कारण उसकी अपनी इन्वेंटरी खाली हो रही है। चीन का ध्यान अपने क्षेत्र में डोमिनेंस बढ़ाने पर है और ऊर्जा संकट के कारण उसने अपने सोलर पैनल व इलेक्ट्रिक व्हीकल के एक्सपोर्ट में जबरदस्त वृद्धि की है। दूसरी तरफ रूस को तेल की कीमतें बढ़ने और प्रतिबंधों में ढील मिलने से आर्थिक लाभ हो रहा है, क्योंकि अब अमेरिका का पूरा ध्यान ईरान पर केंद्रित है और यूक्रेन को मिलने वाली मदद धीमी पड़ गई है।

इजरायल का भविष्य और भारत की रणनीति

इजरायल को अंततः अमेरिका की बात माननी होगी क्योंकि वह आर्थिक और सैन्य मदद के बिना टिक नहीं सकता। इजरायल के 24 बिलियन डॉलर के रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका देता है। बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह युद्ध अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने का एक जरिया है। भारत के रुख पर रोबिंदर सचदेव ने कहा कि हमारी विदेश नीति पूरी तरह संतुलित है। भारत के पास इन पुराने संघर्षों को सुलझाने का कोई सीधा टूल नहीं है, इसलिए शांति की वकालत करना सबसे सही रास्ता है। हालांकि, ग्लोबल पावर बनने के लिए भारत को अपने राजनयिक स्टाफ की संख्या 1,000 से बढ़ाकर 2,000 करनी होगी और अधिक विशेषज्ञों की भर्ती करनी होगी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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