अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियमों में बड़ा बदलाव: PERM प्रोग्राम रुकने से 1 लाख भारतीय प्रोफेशनल्स संकट में राष्ट्रीय राजनीति 14 घंटे पहले 2
अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने प्रमुख आईटी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाते हुए पर्म सर्टिफिकेशन प्रक्रिया को निलंबित कर दिया है, जिससे वहां रह रहे हजारों भारतीय कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटक गया है।

ग्रीन कार्ड नियमों में सख्ती और भारतीय टेक वर्कर्स की मुश्किल

अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियों में किए गए एक अचानक और कड़े बदलाव ने वहां काम कर रहे एक लाख से अधिक भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिकी फेडरल अथॉरिटीज ने इन्फोसिस और टीसीएस जैसी बड़ी आईटी कंपनियों को पर्म एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। लेबर सेक्रेटरी ने इन नामी कंपनियों पर वीजा नियमों के उल्लंघन और लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया के गलत इस्तेमाल का गंभीर आरोप लगाया है। यह प्रतिबंध केवल इन्हीं दो कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि माइक्रोसॉफ्ट और अडोबी जैसी टेक दिग्गज भी इसकी चपेट में आ गई हैं।

गोल्डन केज की स्थिति और परिवारों पर असर

हजारों भारतीय टेक वर्कर्स के लिए यह स्थिति एक 'गोल्डन केज' यानी सुनहरे पिंजरे जैसी हो गई है। अमेरिकी नियमों के अनुसार, वहां लीगल स्टेटस बनाए रखने के लिए स्पॉन्सर करने वाली कंपनी के साथ जुड़े रहना अनिवार्य होता है। चूंकि अब कंपनियां नए पर्म एप्लिकेशन फाइल करने में असमर्थ हैं और पेंडिंग पड़े सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी ठप हो चुकी है, ऐसे में ग्रीन कार्ड मिलने का रास्ता पूरी तरह से बंद हो गया है। इसका सीधा असर एच-1बी वीजा धारकों के साथ-साथ उनके परिवारों पर भी पड़ रहा है। एच-4 वीजा पर रहने वाले जीवनसाथियों के वर्क ऑथराइजेशन पर खतरा मंडराने लगा है और बड़ी उम्र के बच्चों के सामने डिपोर्टेशन का डर पैदा हो गया है।

करियर की प्रगति और आर्थिक अनिश्चितता

इस प्रतिबंध का आर्थिक और करियर संबंधी असर काफी गहरा है। जो टेक वर्कर्स ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में फंसे हुए हैं, वे अब अपनी मर्जी से कंपनियां नहीं बदल सकते। यदि वे ऐसा करने की कोशिश करते हैं या अपनी कंपनी में कोई प्रमोशन या नया टेक्निकल रोल स्वीकार करते हैं, तो उन्हें अपना वर्षों पुराना फाइलिंग टाइमलाइन फिर से रीसेट करना पड़ सकता है। इन इंजीनियरों के लिए अब करियर की गति पूरी तरह से रुक गई है। परिवारों के लिए घर खरीदने जैसे बड़े वित्तीय फैसले लेना या बच्चों की शिक्षा की योजना बनाना अब अत्यधिक जोखिम भरा हो गया है। उनकी पूरी जिंदगी अब प्रशासनिक अपीलों और कानूनी दांव-पेचों के भरोसे टिकी हुई है।

आईटी सेक्टर के लिए भविष्य की राह और विकल्प

ट्रंप प्रशासन द्वारा उठाया गया यह कदम इमिग्रेशन पॉलिसी को सख्ती से लागू करने की दिशा में एक बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है। इससे अमेरिका में ऑफशोर कंसल्टिंग स्ट्रक्चर पर सरकार की निगरानी और सख्ती काफी बढ़ गई है। प्रभावित आईटी कंपनियां अब इस फैसले के खिलाफ कानूनी रास्तों की तलाश कर रही हैं, लेकिन तुरंत कोई राहत मिलने की उम्मीद कम है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि लंबे समय से चल रही इस अनिश्चितता के कारण अब भारतीय टेक टैलेंट दूसरे देशों की ओर रुख कर सकता है। साथ ही, बहुत से लोग अब वापस भारत आकर अपने टेक इकोसिस्टम में योगदान देने के विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि क्या कंपनियां इस बैन से बाहर निकल पाती हैं या भारतीय प्रोफेशनल्स को ग्रीन कार्ड की इस कठिन डगर पर कुछ और समय तक संघर्ष करना होगा।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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