जीवनशैली
17 घंटे पहले
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विचारों
आज का दौर पूरी तरह डिजिटल टिकटिंग का है। मोबाइल पर एक क्लिक और क्यूआर कोड या ई-टिकट लेकर हम बेफिक्र सफर पर निकल पड़ते हैं। लेकिन क्या आपको वह जमाना याद है जब रेलवे काउंटर से कड़क कागज वाला टिकट हाथ में थमाया जाता था? अगर आपने 90 के दशक या उसके बाद ट्रेन का सफर किया होगा, तो आपने जरूर ध्यान दिया होगा कि उन टिकटों के दोनों किनारों पर एक सीध में छोटे-छोटे छेद बने रहते थे।
बचपन में हममें से ज्यादातर लोग यही मान बैठते थे कि यह कोई खास डिजाइन है या फिर टिकट को आसानी से फाड़ने के मकसद से ऐसा बनाया गया है। पर जरा रुकिए! रेलवे में कोई भी चीज बेवजह नहीं होती। टिकट के किनारों पर बने इन मामूली से दिखने वाले छेदों के पीछे एक शानदार तकनीक छिपी हुई थी। आइए इसकी पूरी हकीकत जानते हैं।
डिजाइन नहीं, छपाई की असली 'लाइफलाइन' थे ये छेद
इंटरनेट और आधुनिक कंप्यूटरों के आने से पहले भारतीय रेलवे के लिए रोजाना लाखों यात्रियों के टिकट छापना बेहद चुनौतीपूर्ण काम हुआ करता था। उस वक्त आज की तरह न तो लेजर प्रिंटर थे और न ही डिजिटल प्रिंटर। उस दौर में टिकट छापने के लिए 'डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर' का इस्तेमाल होता था, जो चलते समय 'चिररर-चिररर' की तेज आवाज निकालते थे।
टिकटों के किनारों पर नजर आने वाले इन छोटे छेदों को तकनीकी भाषा में 'स्प्रॉकेट होल्स' कहा जाता है। पुराने समय में टिकट आज की तरह अलग-अलग पन्नों के रूप में नहीं छपते थे, बल्कि एक बहुत लंबे और लगातार जुड़े हुए कागज के रोल के रूप में प्रिंटर के भीतर जाते थे।
कैसे काम करते थे स्प्रॉकेट होल्स
प्रिंटर के अंदर छोटे-छोटे दांतों वाले पहिये यानी गियर्स लगे होते थे। जैसे ही छपाई शुरू होती, ये दांत कागज के किनारों पर बने छेदों में फंसकर उसे एकदम सटीक रफ्तार और बिल्कुल सीधे एलाइनमेंट के साथ आगे की ओर खींचते थे। यही व्यवस्था टिकट को सही दिशा और गति में बढ़ाती रहती थी।
अगर ये छेद न होते तो हो जाती बड़ी गड़बड़
अब सवाल यह उठता है कि कागज को तो बिना छेद के भी रोलर की मदद से आगे खिसकाया जा सकता था, फिर आखिर इन छेदों की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल, लगातार चलती छपाई के दौरान बिना छेद वाला लंबा कागज बार-बार फिसल जाता या अपनी जगह से तिरछा हो जाता।
रेलवे टिकट पर ट्रेन नंबर, सफर की तारीख, स्टेशन का नाम, किराया और कोच या सीट नंबर जैसी बेहद अहम जानकारियां छपती हैं। अगर छपाई के वक्त कागज जरा सा भी अपनी जगह से सरक जाता, तो ये तमाम जानकारियां गलत जगह पर या कटी-फटी हालत में छप जातीं। इससे यात्रियों के साथ-साथ टीटीई के लिए भी भारी भ्रम की स्थिति बन जाती। ये स्प्रॉकेट होल्स ही यह तय करते थे कि लाखों की तादाद में छपने के बावजूद हर टिकट पर हर जानकारी बिल्कुल सही जगह पर प्रिंट हो।
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