बिहार
एक घंटा पहले
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पपीते की खेती पर बरसात की मार
पश्चिम चंपारण जिले में पपीते की बागवानी एक बड़े और व्यावसायिक स्तर पर की जाती है। जिले के नौतन, बैरिया, मझौलिया, चनपटिया, योगापट्टी, रामनगर, बगहा और मधुबनी जैसे प्रखंडों में किसान इसे अपनी आजीविका का मुख्य साधन मानते हैं। हालांकि, बरसात का मौजूदा मौसम इन किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। खेतों में अत्यधिक नमी और जल जमाव के कारण पपीते के पौधों में कई घातक बीमारियां पनपने लगी हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस समय तना गलन, जड़ सड़न और लीफ कर्ल जैसे तीन प्रमुख रोगों का खतरा मंडरा रहा है, जो पूरी फसल को रातों-रात नष्ट करने की क्षमता रखते हैं।
तना गलन: भूरे धब्बों से शुरू होता है विनाश
करीब चार एकड़ में पपीते की खेती करने वाले किसान रामदुलार यादव का कहना है कि खेतों में पानी की निकासी का सही प्रबंध न होना इस रोग का सबसे बड़ा कारण है। बरसात में जब पानी जमा होता है, तो पौधों के निचले तने पर भूरे या काले धब्बे उभरने लगते हैं। असल में यह फफूंद का संक्रमण होता है। धीरे-धीरे इसका असर पत्तियों पर दिखने लगता है, जो पीली पड़कर झड़ने लगती हैं और अंत में पूरा पौधा सूख जाता है।
बचाव के सटीक तरीके
- खेतों में जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
- जिन पौधों में संक्रमण के लक्षण दिखाई दें, उन्हें तुरंत उखाड़कर जला देना चाहिए ताकि रोग अन्य पौधों तक न फैले।
- जुलाई और अगस्त के महीनों में कम से कम तीन बार बोडों मिश्रण 6:6:50 का छिड़काव करें।
- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3 प्रतिशत या टाप्सीन-एम 0.1 प्रतिशत का उपयोग भी तना गलन को रोकने में बेहद प्रभावी साबित होता है।
जड़ सड़न: अदृश्य रोग जो गिरा देता है पौधा
जड़ सड़न रोग भी काफी हद तक जल जमाव से जुड़ा हुआ है। लगातार नमी रहने के कारण पौधों की जड़ें धीरे-धीरे सड़ने लगती हैं, जिससे पौधे की पोषण प्रणाली बाधित हो जाती है। पौधा अंदर से कमजोर होकर अचानक झुकने या गिरने लगता है। इसका उपचार करने के लिए भी जल निकासी की व्यवस्था अनिवार्य है। किसान इसके नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या जैविक फफूंदनाशी के रूप में ट्राइकोडर्मा का छिड़काव कर सकते हैं। समय रहते इन रसायनों का प्रयोग करने से पौधों को मरने से बचाया जा सकता है।
लीफ कर्ल: सबसे खतरनाक विषाणु जनित रोग
पपीते के लिए लीफ कर्ल रोग एक अभिशाप की तरह है। यह एक विषाणु जनित रोग है, जिसे मुख्य रूप से सफेद मक्खियां फैलाती हैं। इस रोग की चपेट में आते ही पत्तियां सिकुड़कर मुड़ने लगती हैं, जिससे पौधे का विकास रुक जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस रोग के कारण खेत की 80 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो सकती है, इसलिए इसके प्रबंधन में देरी करना भारी नुकसान का सौदा हो सकता है।
प्रबंधन की रणनीति
- हमेशा स्वस्थ और रोगमुक्त पौधों का ही रोपण करना चाहिए।
- यदि कोई पौधा लीफ कर्ल से ग्रस्त दिखे, तो उसे बिना देरी किए उखाड़कर खेत से दूर गड्ढे में गाड़ देना चाहिए ताकि संक्रमण न फैले।
- सफेद मक्खियों की आबादी को रोकने के लिए डाइमिथोएट का घोल तैयार करें। इसकी 1 मि.ली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर नियमित अंतराल पर छिड़काव करने से लीफ कर्ल को फैलने से रोका जा सकता है।
पपीते के किसान यदि बरसात के इस नाजुक दौर में अपने खेतों की नियमित निगरानी करें और विशेषज्ञों द्वारा बताए गए इन सुरक्षात्मक उपायों को अपनाएं, तो वे अपनी बहुमूल्य फसल को सुरक्षित रख सकते हैं। सही समय पर सही सावधानी ही फसल को बर्बादी से बचा सकती है।
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