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3 घंटे पहले
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विचारों
संघर्ष से सफलता की नई इबारत
बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव प्रखंड स्थित कसिया गांव की रहने वाली कुसुम देवी की कहानी उन तमाम महिलाओं के लिए एक मशाल की तरह है जो आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं। एक समय था जब कुसुम देवी और उनके पति अपनी गृहस्थी चलाने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर थे। गरीबी का आलम यह था कि परिवार के पास अपना खुद का घर भी नहीं था और उन्हें दूसरों के घरों में रहकर अपना जीवन बसर करना पड़ता था। परिवार में पति-पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी की जिम्मेदारी थी। दिहाड़ी मजदूरी से होने वाली आय इतनी कम और अनियमित थी कि बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।
जीविका समूह से मिली नई पहचान
आर्थिक तंगहाली के बीच कुसुम देवी ने हार नहीं मानी और अपने परिवार की स्थिति बदलने के लिए एक बेहतर रास्ता तलाशने का फैसला किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात जीविका समूह के लोगों से हुई। उन्होंने दुर्गा स्वयं सहायता समूह की सदस्यता ली, जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस समूह से जुड़ने के बाद उन्हें नियमित बचत की आदत पड़ी और वित्तीय प्रबंधन की बारीकियों को समझने का मौका मिला। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि समूह में शामिल होने के बाद कुसुम देवी के भीतर आत्मविश्वास का संचार हुआ, जिससे उन्हें यह यकीन हो गया कि वह मजदूरी के चक्र से बाहर निकलकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं।
सतत जीविकोपार्जन योजना का मिला लाभ
कुसुम देवी की मेहनत और समूह के प्रति उनकी निष्ठा को देखते हुए उन्हें सतत जीविकोपार्जन योजना यानी SJY के तहत **20,000** रुपये की वित्तीय सहायता राशि प्रदान की गई। यह राशि उनके लिए एक नई शुरुआत लेकर आई। उन्होंने इस पैसे का इस्तेमाल घर के घरेलू खर्चों में करने के बजाय, खुद का कोई काम शुरू करने में लगाने का साहसी फैसला लिया। इस धनराशि से उन्होंने अपने गांव में एक छोटी सी किराने की दुकान खोली। दुकान खोलने के बाद उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया और उन्हें दिहाड़ी मजदूरी के भरोसे नहीं रहना पड़ा।
आत्मनिर्भरता की नई मिसाल
आज स्थिति यह है कि कुसुम देवी अपनी दुकान को पूरी कुशलता के साथ संचालित कर रही हैं। इस छोटे से व्यवसाय की बदौलत वह हर महीने लगभग **4,000** रुपये की आय अर्जित कर रही हैं। किराने की यह दुकान अब उनके लिए महज कमाई का एक जरिया नहीं है, बल्कि यह उनके बढ़ते हुए आत्मविश्वास और घर के आर्थिक फैसलों में उनकी भागीदारी का प्रतीक बन गई है।
कुसुम देवी की यह सफलता की कहानी कसिया गांव और आसपास के क्षेत्रों की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है। वह अब न केवल अपने बच्चों की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर रही हैं, बल्कि अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से समाज में एक मिसाल बनकर उभरी हैं। उनकी यह कहानी साबित करती है कि अगर सही मार्गदर्शन और थोड़ी सी आर्थिक मदद मिल जाए, तो कोई भी महिला अपनी तकदीर खुद लिख सकती है और अपने परिवार को एक बेहतर भविष्य दे सकती है।
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