चीन से भागकर 9753 किलोमीटर दूर कनाडा पहुंचे डोंग गुआंगपिंग, रबर की नाव में 40 घंटे मौत से लड़ी जंग विश्व 3 महीने पहले 140
चीन के दमनकारी शासन से तंग आकर 68 वर्षीय लोकतंत्र समर्थक डोंग गुआंगपिंग ने अपनी जान जोखिम में डालकर रबर की एक छोटी नाव से समुद्र पार किया। अंततः 40 घंटे के खतरनाक सफर के बाद वे सुरक्षित कनाडा पहुंच गए और एक दशक बाद खुली हवा में सांस ली।

चीन की कैद से आजादी की एक साहसी कहानी

दुनिया में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, लेकिन 68 वर्षीय डोंग गुआंगपिंग का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। चीन में शी जिनपिंग की सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले डोंग ने दशकों तक दमन और जेल की यातनाएं सही हैं। अंततः उन्होंने मौत को मात देते हुए एक रबर की छोटी सी डिंगी नाव का सहारा लिया और समुद्र की लहरों को चीरते हुए 9753 किलोमीटर दूर कनाडा में शरण हासिल की। उनका कहना है कि चीन में रहना एक पिंजरे में बंद रहने जैसा था, जहां हर कदम पर पुलिस की निगरानी और घुटन का अहसास होता था।

पुलिस की नौकरी से लेकर लोकतंत्र की राह तक

डोंग गुआंगपिंग का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। एक समय था जब वे खुद चीन में पुलिस अधिकारी के पद पर कार्यरत थे, लेकिन उनके भीतर पनप रहे लोकतांत्रिक विचारों ने उन्हें व्यवस्था के खिलाफ खड़ा कर दिया। उन्होंने 1989 के तियानआनमेन चौक आंदोलन को लेकर लेख लिखे और लोकतंत्र के पक्ष में सक्रिय अभियान चलाए। यही वह मोड़ था, जहां से उनकी परेशानियां शुरू हुईं। उन्हें बार-बार गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया। चीन की जेलों में बिताया गया वक्त उनके लिए किसी यातना से कम नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

कई असफल प्रयास और बार-बार जेल की वापसी

कनाडा पहुंचने से पहले डोंग ने कई बार चीन से निकलने की कोशिश की, जो बेहद दर्दनाक रही। वर्ष 2015 में उन्होंने थाईलैंड भागने का प्रयास किया, लेकिन वहां की सरकार ने उन्हें चीन वापस भेज दिया। इसके बाद 2019 में उन्होंने समुद्र के रास्ते ताइवान पहुंचने की जोखिम भरी कोशिश की, जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। फिर 2020 में उन्होंने वियतनाम के जरिए भागने का प्रयास किया, लेकिन वहां भी उन्हें पकड़कर चीन भेज दिया गया। हर बार चीन वापस लौटने पर उन्हें जेल में डाला गया। इन असफलताओं ने उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को और मजबूत कर दिया।

समुद्र के बीच रबर की नाव और 40 घंटे का मौत से सामना

डोंग की चौथी कोशिश 24 मई की सुबह शुरू हुई। वे चीन के शानदोंग प्रांत के वेइहाई शहर से एक छोटी रबर की नाव लेकर निकले, जिसमें एक इंजन भी लगा था। उनका शुरुआती लक्ष्य जापान था। हालांकि, सफर के दौरान मौसम ने अचानक करवट ली और घना कोहरा छा गया। सबसे बड़ी मुसीबत तब आई जब उनके मोबाइल फोन की बैटरी खत्म होने लगी और पावर बैंक भी काम करना बंद कर गया, जिससे नेविगेशन के लिए जरूरी GPS का संपर्क टूट गया। ऐसी स्थिति में उन्होंने दक्षिण कोरिया की ओर रुख करने का कठिन फैसला लिया। डोंग ने याद करते हुए बताया कि समुद्र में उठती ऊंची लहरें किसी भी पल उनकी नाव को पलट सकती थीं। लेकिन वे जानते थे कि वापस लौटने का मतलब फिर से चीन की जेल की कोठरी में सड़ना है, इसलिए मौत का डर भी उन पर हावी नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि चीन की उस घुटन भरी जिंदगी से तो मौत भी बेहतर विकल्प लग रही थी।

दक्षिण कोरिया में राहत और शरण की प्रक्रिया

समुद्र में 40 घंटे की लंबी मशक्कत के बाद, उन्हें क्षितिज पर रोशनी दिखाई दी। शुरुआत में वहां से गुजर रहे एक बड़े जहाज ने उन्हें नहीं देखा, लेकिन बाद में एक मछली पकड़ने वाली नाव ने उनकी मदद की और अधिकारियों को सूचित किया। दक्षिण कोरियाई तटरक्षक बल ने उन्हें हिरासत में लिया और उन पर आव्रजन नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया। राहत की बात यह रही कि अदालत ने उन्हें जेल में डालने के बजाय रिहाई दी और उन्हें इंचियोन के एक शरणार्थी केंद्र में भेज दिया गया। वहां संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी UNHCR ने दखल दिया और कनाडाई अधिकारियों के साथ समन्वय कर उनके पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की।

कनाडा में अपनों से मिलन और भविष्य की राह

करीब एक सप्ताह के अंतराल के बाद डोंग विमान से टोरंटो पहुंचे। उनकी पत्नी और बेटी पहले से ही कनाडा में बस चुकी थीं। यह संयोग ही है कि 2015 में जब डोंग थाईलैंड में पकड़े गए थे, तब उनके परिवार को कनाडा में शरण मिल चुकी थी, लेकिन उन्हें वापस भेज दिया गया था। अब कनाडा की धरती पर पहुंचकर उन्होंने एक दशक बाद खुद को स्वतंत्र महसूस किया है। हालांकि, डोंग का संघर्ष अभी थमा नहीं है। वे जल्द ही एक सामान्य जीवन शुरू करने के लिए ट्रक ड्राइवर या उबर चालक के रूप में काम करना चाहते हैं। साथ ही, वे थाईलैंड और वियतनाम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने पर विचार कर रहे हैं, जिन्होंने उन्हें शरण देने के बजाय चीन की जेल में धकेल दिया था। उनका अंतिम लक्ष्य चीन में लोकतांत्रिक व्यवस्था और पूर्ण अभिव्यक्ति की आजादी देखना है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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