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4 घंटे पहले
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खुद के जहाज खरीदने की तैयारी में इंडियन ऑयल
सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख तेल विपणन कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन अब कच्चे तेल और लिक्विड पेट्रोलियम गैस यानी LPG की ढुलाई के लिए अपने स्वयं के मालवाहक जहाज खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रही है। हाल के दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास समुद्री आवाजाही में आ रही बाधाओं और जहाजों के बढ़ते किराये ने कंपनी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अपनी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर बेहतर नियंत्रण और आत्मनिर्भरता हासिल करने के उद्देश्य से कंपनी ने यह बड़ा फैसला लिया है।
बोर्ड ने दी है खरीद को मंजूरी
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के निदेशक (वित्त) अनुज जैन ने दूसरी तिमाही के वित्तीय परिणामों के बाद विश्लेषकों से चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने कुछ चुनिंदा कार्गो जहाजों की खरीद को पहले ही हरी झंडी दे दी है। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कई महीने पूर्व ही टेंडर भी जारी किए जा चुके हैं। अनुज जैन के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में भारत की तेल कंपनियों के लिए शिपिंग सेक्टर की ओर विशेष ध्यान देना बहुत आवश्यक हो गया है ताकि ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके।
मेक इन इंडिया के तहत घरेलू निर्माण की संभावना
कंपनी सिर्फ जहाज खरीदने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'मेक इन इंडिया' के अंतर्गत भारत के भीतर ही जहाज निर्माण की संभावनाओं को भी तलाश रही है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही में आ रही रुकावटों ने शिपिंग क्षमता को सुरक्षित करने की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। फिलहाल इंडियन ऑयल के पास एक निश्चित अवधि के अनुबंध पर 3 कच्चे तेल के जहाज और 9 एलपीजी जहाज उपलब्ध हैं।
भाड़े की आसमान छूती कीमतों से राहत की उम्मीद
अनुज जैन ने बताया कि लंबी अवधि के लिए किराये पर लिए गए इन जहाजों ने मौजूदा संकट काल में कंपनी को काफी बचत कराई है। यदि हम तुलना करें, तो हाजिर बाजार में कच्चे तेल के जहाजों का किराया 8 से 10 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाता है, जबकि निश्चित अनुबंध के तहत कंपनी को यह लागत केवल 2.00 से 2.50 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पड़ती है। इसी तरह एलपीजी के मामले में स्थिति और गंभीर है। सामान्य दिनों में एलपीजी का भाड़ा करीब 40 अमेरिकी डॉलर प्रति टन होता था, जो अब हाजिर बाजार में बढ़कर 160 से 180 अमेरिकी डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है। ऐसे में खुद के जहाज होने से कंपनी अपनी लागत को नियंत्रित रख सकेगी।
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