शर्मिष्ठा मुखर्जी का खुलासा- प्रणब दा मानते थे कि नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्हें मिला सीधा जनादेश राष्ट्रीय राजनीति 2 महीने पहले 75
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने एक लेख के जरिए अपने पिता के विचारों को साझा किया है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी जीत को भारतीय राजनीति में एक अभूतपूर्व बदलाव बताया है।

प्रणब मुखर्जी की दृष्टि में मोदी का जनादेश

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की सुपुत्री और कांग्रेस की नेता रहीं शर्मिष्ठा मुखर्जी ने हाल ही में एक लेख के माध्यम से भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डाला है। उन्होंने अपने लेख में इस बात का उल्लेख किया है कि उनके दिवंगत पिता और देश के 13वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का यह मानना था कि नरेंद्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्हें सीधे जनता से प्रधानमंत्री पद के लिए जनादेश प्राप्त हुआ। शर्मिष्ठा मुखर्जी के अनुसार, 2014 का आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र में एक निर्णायक मोड़ था, जिसने नेतृत्व चुनने की पूरी परंपरा को बदल दिया।

चुनाव परिणामों के बाद राष्ट्रपति भवन में हुई चर्चा

शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने लेख में 2014 के चुनावी परिणामों के तत्काल बाद के एक घटनाक्रम को याद किया है। जब लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की, तो नरेंद्र मोदी जीत के बाद राष्ट्रपति भवन में प्रणब मुखर्जी से मिलने पहुंचे थे। उस चर्चा को याद करते हुए शर्मिष्ठा ने लिखा है कि उस वक्त प्रणब दा ने मोदी से चुनाव परिणामों के विश्लेषण के बारे में पूछा था। जब मोदी ने बताया कि तीन दशकों के लंबे अंतराल के बाद किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है, तो प्रणब मुखर्जी ने अपने विशिष्ट प्रोफेसर वाले अंदाज में पूछा कि इसके अलावा और क्या? उस समय मोदी के मौन रहने पर प्रणब दा ने स्पष्ट किया कि यह चुनाव इतिहास में अद्वितीय है, क्योंकि इसमें पहली बार प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर जनता ने सीधे अपना रुख स्पष्ट किया था।

सीधे जनादेश बनाम गठबंधन की राजनीति

शर्मिष्ठा मुखर्जी के लेख के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कोई भी प्रधानमंत्री सीधे तौर पर जनता द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में नहीं चुना गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहले के प्रधानमंत्रियों को या तो उनकी अपनी पार्टी के आंतरिक निर्णयों से चुना गया था, या फिर चुनाव के बाद बनने वाले गठबंधन के गणित ने उनके नाम पर मुहर लगाई थी। उन्होंने उदाहरण देते हुए लिखा कि डॉ. मनमोहन सिंह खुद कोई जननेता नहीं थे, बल्कि उन्हें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा इस पद के लिए नामांकित किया गया था। इसी तरह, पी. वी. नरसिम्हा राव और एच. डी. देवेगौड़ा जैसे नेता प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते समय संसद के सदस्य तक नहीं थे।

राजनीति में राष्ट्रपति प्रणाली जैसा प्रभाव

लेखिका का तर्क है कि 2014 के चुनावों ने भारतीय राजनीति में कुछ हद तक 'राष्ट्रपति प्रणाली' जैसी शैली को जन्म दिया है, जहां मतदाता सीधे तौर पर एक चेहरे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मतदान करते हैं। शर्मिष्ठा लिखती हैं कि 2014 से पहले राष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर नरेंद्र मोदी का नाम अपेक्षाकृत नया था। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी कुशल प्रशासनिक छवि बनाने वाले मोदी जब 2014 में लोकसभा चुनाव में उतरे, तो वे सीधे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में अपनी पहली ही सांसद की पारी में शीर्ष पद तक पहुंच गए। यह एक दुर्लभ और अभूतपूर्व घटना थी। उन्होंने संसद की सीढ़ियों पर नतमस्तक होते हुए पीएम मोदी की उस मशहूर तस्वीर का भी जिक्र किया, जिसने देशवासियों के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ा था।

भाजपा की जीत के पीछे के प्रमुख कारण

शर्मिष्ठा मुखर्जी ने केवल मोदी के प्रभाव ही नहीं, बल्कि भाजपा के संगठनात्मक ढांचे की भी सराहना की है। उनके अनुसार, भाजपा की विजय के पीछे कई कारण हैं जैसे जमीनी स्तर पर पार्टी का मजबूत संगठन, जातियों और समुदायों के बीच पैठ बनाने की रणनीति, और अपनी गलतियों से सीखकर तेजी से सुधार करने की क्षमता। हालांकि, वह इस बात को पूरी तरह स्वीकार करती हैं कि 'मोदी का चेहरा' ही भाजपा का सबसे बड़ा ट्रम्प कार्ड है। लोग मोदी में एक ऐसे नेता की छवि देखते हैं, जिसने कड़ी मेहनत से अपना मुकाम हासिल किया है, न कि किसी वंशवादी विरासत के कारण।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण और ब्रांड मोदी

लेखिका ने पश्चिम बंगाल के अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ हुई बातचीत का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया है। उनके कई परिचित जो वैचारिक रूप से कांग्रेस के प्रति झुकाव रखते हैं, वे भी विधानसभा चुनावों में भाजपा को वोट देने की बात करते थे। जब शर्मिष्ठा उन्हें टोकती थीं कि यह विधानसभा चुनाव है और मोदी इसमें उम्मीदवार नहीं हैं, तो उनका जवाब होता था, 'ओई एक-ई व्यापार' यानी बात तो एक ही है। यह इस बात का प्रमाण है कि 'ब्रांड मोदी' किस हद तक जनमानस में बस चुका है।

भविष्य की ओर एक आकांक्षी भारत

शर्मिष्ठा मुखर्जी मानती हैं कि नरेंद्र मोदी आज भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं और उन्हें देश के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में गिना जाना चाहिए। गठबंधन सरकारों की मजबूरियों से बाहर निकलकर उन्होंने एक स्थिर शासन दिया है। उन्होंने अंत में कहा कि नीतियों पर असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हो सकती है, लेकिन मोदी का करिश्मा और 'आकांक्षी भारत' के साथ उनका जुड़ाव नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने उम्मीद जताई है कि जो भारी जनादेश उन्हें मिला है, वे उसके साथ न्याय करते हुए देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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