राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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तिहाड़ जेल में आम कैदियों जैसे हालात
सौरव दास और आशुतोष रांका फिलहाल तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे हैं। जेल के भीतर इनके साथ किसी भी तरह का विशेष या वीआईपी व्यवहार नहीं किया जा रहा है। ये दोनों ही वहां अन्य सामान्य कैदियों की तरह ही जमीन पर सोने को मजबूर हैं। जेल सूत्रों के अनुसार, इन दोनों को सामान्य कैदियों वाला खाना ही परोसा जा रहा है, जिसमें मुख्य रूप से दाल, रोटी और सब्जी शामिल है। इनके लिए वार्ड में पुलिस की कड़ी निगरानी में टहलने का समय निश्चित है। तिहाड़ में अन्य कैदियों के बीच भी इन लोगों के प्रति नाराजगी देखी जा रही है, जिसके चलते उन्हें सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जेल के भीतर उन्हें हमले या अन्य अप्रिय घटनाओं का डर सता रहा है, जो बाहर खुद को किसी बड़े आंदोलन के नायक के रूप में पेश कर रहे थे, वे अब जेल की चारदीवारी के भीतर अपने किए का हिसाब भुगत रहे हैं।
कानूनी शिकंजा और एससी-एसटी एक्ट की मार
कॉकरोच पार्टी से जुड़े नेताओं की मुश्किलें केवल जेल तक सीमित नहीं हैं। एसीपी विवेक भगत की शिकायत पर संसद मार्ग थाने में एक गंभीर प्राथमिकी दर्ज की गई है। इस कानूनी मामले में अभिजीत दीपके, सौरव दास, आशुतोष रांका और रत्ना सिंह को नामजद किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस एफआईआर में एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को भी शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त, भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं, जैसे 221, 356(2) और 3(5) के तहत भी कार्रवाई की जा रही है। स्वतंत्र पत्रकार रोजी और गजेंद्र सिंह का नाम भी इस मामले में है, जिन पर पुलिस अधिकारी के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणियां करने और आपत्तिजनक नारे लगाने का आरोप है। यदि पुलिस के आरोप सही साबित होते हैं, तो इन सभी नेताओं को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है, क्योंकि एससी-एसटी एक्ट में जमानत मिलना बेहद कठिन होता है।
सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी को तगड़ा झटका
इधर तिहाड़ जेल में कॉकरोच पार्टी के नेताओं की बदहाली की खबरें सामने आ रही हैं, उधर सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी की राजनीति को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 12 अक्टूबर को राहुल गांधी अपने समर्थकों के भारी हुजूम के साथ सुप्रीम कोर्ट परिसर में दाखिल हो गए थे। यह घटना उस समय हुई जब अदालत का कामकाज बंद हो चुका था। उनके साथ प्रियंका वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य इंडी गठबंधन के नेता भी मौजूद थे। कोर्ट के भीतर इस तरह की भीड़ जुटाकर माहौल बनाने को लेकर वकीलों के एक बड़े वर्ग ने कड़ी आपत्ति जताई थी। मामले पर सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायपालिका इतनी कमजोर नहीं है कि उसे किसी दबाव या डराने-धमकाने वाली हरकत से झुकाया जा सके। कोर्ट ने राहुल गांधी समेत अन्य नेताओं को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और उस दिन के सीसीटीवी फुटेज को संरक्षित करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा, एक महिला पत्रकार द्वारा लगाए गए धक्का-मुक्की के आरोपों की जांच के आदेश भी दिए गए हैं।
दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में किया अपना पक्ष साफ
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को लगाई गई पाबंदियों का विस्तार से ब्योरा पेश किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियातन कदम उठाए थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस ने कोर्ट से कोई बिना शर्त माफी नहीं मांगी है, बल्कि यह एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया है। पुलिस का तर्क था कि दिल्ली देश की राजधानी है और यहां सार्वजनिक सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि 20 जुलाई को हुए पिछले प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को देखते हुए पुलिस को सख्ती बरतनी पड़ी। साथ ही, इंटरनेट बंद करने जैसे कदम भी इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर उठाए गए थे। कोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि सोशल मीडिया रील बनाने वाले लोगों और स्वतंत्र पत्रकारों में फर्क करना आज के डिजिटल युग में मुश्किल हो गया है, जिसकी वजह से प्रदर्शन स्थलों पर भ्रम की स्थिति बनी थी।
बांग्लादेश मॉडल और सोरोस कनेक्शन का आरोप
पूरे देश में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये प्रदर्शन भारत में बांग्लादेश और नेपाल जैसी अस्थिरता पैदा करने की सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं। नेहा बोरा जैसे चेहरे, जो लगातार इन विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में दिख रहे हैं, उन पर विदेशी एजेंडे के तहत काम करने का आरोप लग रहा है। उनकी टी-शर्ट पर छपे प्रतीकों को लेकर भी काफी चर्चा हुई है, जिसे कुछ लोग हिंसक प्रदर्शनों से जोड़ रहे हैं। इसके अलावा, जॉर्ज सोरोस जैसे अंतरराष्ट्रीय फंडिंग से जुड़े नामों का जिक्र भी बार-बार सामने आ रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि मोदी विरोधी इकोसिस्टम को कहीं न कहीं से बाहर से मदद मिल रही है। हाल ही में एक्टर इमरान खान, जो कथित तौर पर अमेरिकी नागरिक हैं, को भी इसी तरह के एक प्रदर्शन में शामिल होने और इमीग्रेशन नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में देश छोड़ने का निर्देश दिया गया है। कॉकरोच पार्टी के नेताओं का यह अहंकार अब ढह रहा है और कानून अपनी गति से अपना काम कर रहा है। आने वाले दिनों में अभिजीत दीपके और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं क्योंकि जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
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